तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के मरवाही वनमंडल एक बार फिर चर्चाओं के केंद्र में है। इस बार चर्चा किसी नई योजना या वन संरक्षण अभियान की नहीं, बल्कि उन शिकायतों की है जो वर्षों से शासन और प्रशासन के विभिन्न स्तरों तक पहुंचने के बावजूद कथित रूप से निर्णायक कार्रवाई का इंतजार कर रही हैं। पूर्व प्रभारी डीएफओ संजय त्रिपाठी और पूर्व डीएफओ रौनक अग्रवाल के कार्यकाल से जुड़े कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय, राज्य शासन, मुख्यमंत्री, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप तथा विभागीय सचिव सहित कई स्तरों पर शिकायतें भेजे जाने का दावा किया जाता रहा है। इसके बावजूद यदि अब तक किसी प्रकार की स्पष्ट विभागीय कार्रवाई, जांच रिपोर्ट या दंडात्मक निर्णय सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है, तो स्वाभाविक रूप से अनेक प्रश्न उठ रहे हैं।सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि शिकायतें तथ्यहीन थीं, तो उन्हें स्पष्ट रूप से खारिज क्यों नहीं किया गया? और यदि शिकायतों में प्रथम दृष्टया कोई आधार था, तो फिर जांच की प्रगति और परिणाम सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए? प्रशासनिक पारदर्शिता की दृष्टि से यह मौन स्वयं अनेक शंकाओं को जन्म देता है।विभागीय सूत्रों ने बताया कि वन विभाग हमेशा से संवेदनशील विभाग माना जाता है। करोड़ों रुपये की वृक्षारोपण योजनाएं, कैंपा मद, वन संरक्षण, जैव विविधता और पर्यावरणीय परियोजनाओं पर सरकारी धन खर्च होता है। ऐसे विभाग में यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध भ्रष्टाचार या वित्तीय अनियमितता के आरोप लगते हैं, तो शासन से अपेक्षा रहती है कि वह निष्पक्ष और समयबद्ध जांच सुनिश्चित करे। यही लोकतांत्रिक जवाबदेही की मूल भावना भी है।राज्य में वर्तमान सरकार ने सत्ता संभालने के बाद भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का संकल्प व्यक्त किया था। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और वन मंत्री केदार कश्यप ने भी विभिन्न अवसरों पर सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही को सरकार की प्राथमिकता बताया है। ऐसे में मरवाही वनमंडल से जुड़े इन मामलों पर लंबे समय तक स्पष्ट कार्रवाई का अभाव विपक्ष ही नहीं बल्कि आम नागरिकों के बीच भी चर्चा का विषय बनता जा रहा है।जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों का कहना है कि यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध गंभीर शिकायतें प्राप्त हुई हैं तो जांच की वर्तमान स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए। यदि जांच चल रही है तो उसकी समय-सीमा क्या है? यदि जांच पूरी हो चुकी है तो उसका निष्कर्ष क्या है? और यदि शिकायतें निराधार पाई गई हैं तो संबंधित शिकायतकर्ताओं को इसकी विधिवत जानकारी क्यों नहीं दी गई? इन सवालों का उत्तर मिलना प्रशासनिक पारदर्शिता के लिए आवश्यक माना जा रहा है।विभागीय सूत्रों का कहना है कि भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई में अनावश्यक विलंब स्वयं शासन की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है। जब छोटी-छोटी प्रशासनिक त्रुटियों पर तत्काल कार्रवाई होती है, तब गंभीर वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामलों में वर्षों तक निर्णय लंबित रहने से व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।वन विभाग से जुड़े जानकारों का कहना है कि यदि शिकायतों में पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे, तो जांच एजेंसियों को स्पष्ट रिपोर्ट देकर मामले का पटाक्षेप कर देना चाहिए था। वहीं यदि साक्ष्य मौजूद हैं, तो दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय और कानूनी कार्रवाई में विलंब का कारण भी सार्वजनिक होना चाहिए।आज आवश्यकता किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि तथ्यों को सामने लाने की है। निष्पक्ष जांच ही यह तय कर सकती है कि शिकायतों में कितना दम है और कौन जिम्मेदार है। लेकिन जांच की स्थिति अस्पष्ट रहने से तरह-तरह की अटकलों को बल मिलता है, जो न तो शासन के हित में है और न ही ईमानदारी से कार्य करने वाले अधिकारियों के।अब निगाहें राज्य सरकार, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग और संबंधित जांच एजेंसियों पर हैं। जनता यह जानना चाहती है कि शिकायतों का अंतिम परिणाम क्या हुआ, जांच किस चरण में है और यदि कोई अनियमितता पाई गई है तो जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध क्या कार्रवाई प्रस्तावित या की गई है। वहीं सर्वव्यापी अपने आगामी अंकों में उक्त अफसरों के खिलाफ मिले शिकायतों पर कार्रवाई क्यों लंबित है,उसका खुलासा भी जल्द ही करेंगे..!


