तरुण कौशिक, संपादक, सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में बहुचर्चित शराब घोटाले को लेकर जहां जांच एजेंसियों ने लगातार कार्रवाई की और कई बड़े अधिकारियों व कारोबारियों पर शिकंजा कसा, वहीं अब वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग में केंद्र एवं राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं में कथित रूप से हुए भारी वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि विभागीय स्तर पर जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत होने के बाद भी दोषियों के विरुद्ध ठोस कार्रवाई नहीं हो रही है, जिससे पूरे मामले पर पर्दा डालने की आशंका व्यक्त की जा रही है।सूत्रों के अनुसार विभाग में पौधरोपण, कैंपा (CAMPA), ग्रीन क्रेडिट, वन संरक्षण, जलवायु परिवर्तन तथा अन्य योजनाओं में करोड़ों रुपये के कार्यों में अनियमितताओं की शिकायतों के बाद जांच कराई गई। यदि जांच में अनियमितताएं प्रमाणित हुई हैं, तो सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि संबंधित अधिकारियों एवं जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध अब तक विभागीय अथवा आपराधिक कार्रवाई क्यों नहीं की गई?राजनीतिक एवं प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि यदि किसी जांच प्रतिवेदन में दोष स्पष्ट हैं, तब भी कार्रवाई नहीं होना शासन की भ्रष्टाचार के प्रति कथित “जीरो टॉलरेंस” नीति पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। विपक्ष और सामाजिक संगठनों का भी मानना है कि भ्रष्टाचार के मामलों में समान मापदंड अपनाए जाने चाहिए और किसी भी विभाग को विशेष संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जांच रिपोर्ट को लंबे समय तक दबाकर रखा जाता है या दोषियों पर कार्रवाई टाल दी जाती है, तो इससे न केवल सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता प्रभावित होती है बल्कि ईमानदार अधिकारियों का मनोबल भी कमजोर होता है। केंद्र और राज्य सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण एवं जलवायु परिवर्तन जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं के लिए आवंटित धनराशि का उद्देश्य जनहित और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण है। ऐसे में यदि इन योजनाओं में भ्रष्टाचार के आरोप हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई अत्यंत आवश्यक है।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के मंत्री और विभागीय सचिव जांच प्रतिवेदन के आधार पर कठोर कार्रवाई करेंगे, या फिर मामले को लंबित रखकर भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे अधिकारियों और संबंधित लोगों को संरक्षण मिलता रहेगा?यदि जांच रिपोर्ट में अनियमितताएं प्रमाणित हैं, तो शासन को पारदर्शिता के हित में उसे सार्वजनिक करते हुए दोषियों के विरुद्ध विधिसम्मत कार्रवाई करनी चाहिए। वहीं यदि आरोप प्रमाणित नहीं हुए हैं, तो सरकार को भी स्पष्ट रूप से अपना पक्ष सामने रखना चाहिए, ताकि अनावश्यक भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके।


