संपादक की कलम से...रथयात्रा अऊ रजुतिया तिहार : छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति के जीवंत पहचान। - Sarvavyapi संपादक की कलम से...रथयात्रा अऊ रजुतिया तिहार : छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति के जीवंत पहचान। - Sarvavyapi

संपादक की कलम से…रथयात्रा अऊ रजुतिया तिहार : छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति के जीवंत पहचान।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ के माटी मं तिहार मन सिरिफ पूजा-पाठ के दिन नइ होवंय, बल्कि लोकजीवन, परंपरा, आस्था अऊ सामाजिक एकता के पहचान आय। अइसने दू महत्वपूर्ण लोक तिहार हवंय – रथयात्रा अऊ रजुतिया तिहार। ये दूनों परब छत्तीसगढ़िया संस्कृति के समृद्ध परंपरा ल आज घलो जीवंत रखे हवंय।आषाढ़ महीना मं भगवान जगन्नाथ, बलभद्र अऊ सुभद्रा के रथयात्रा निकारे जाथे। गांव-गांव अऊ शहर-शहर मं भगवान के रथ सजाय जाथे, भजन-कीर्तन होथे अऊ श्रद्धालु मन बड़े उत्साह ले रथ ल खींचथें। लोकमान्यता हे कि रथ खींचे ले भगवान के कृपा मिलथे अऊ जीवन मं सुख-समृद्धि आथे।रथयात्रा के बाद आवय रजुतिया तिहार, जऊन छत्तीसगढ़ के अपन लोक परंपरा आय। ए दिन बहिनी मन अपन भाई के सुख-समृद्धि अऊ दीर्घायु बर भगवान ले मंगल कामना करथें। गांव-देहात मं रजुतिया के अलग-अलग लोक रीति-रिवाज हवंय। परिवार मन एक संग जुटथें, देवी-देवता के पूजा करथें अऊ अपन पारिवारिक संबंध ल अउ मजबूत बनाथें।रजुतिया सिरिफ एक तिहार नइ, बल्कि भाई-बहिनी के अपनापन, मया, सम्मान अऊ पारिवारिक एकता के प्रतीक आय। ये परब छत्तीसगढ़िया लोक संस्कृति के मौलिक स्वरूप ल आज घलो जीवंत रखे हवय।आज जब आधुनिकता के प्रभाव ले कई लोक परंपरा बिसराय जात हवंय, त अइसने तिहार मन नई पीढ़ी ल अपन संस्कृति अऊ जड़ ले जोड़े के काम करथें। हमर सबो झन के जिम्मेदारी हे कि रथयात्रा अऊ रजुतिया जइसने लोक तिहार मन के महत्व ल समझन, संजोके रखन अऊ अगली पीढ़ी तक पहुंचावन।रथयात्रा आस्था के परब आय, त रजुतिया अपन संस्कृति, पारिवारिक मया अऊ छत्तीसगढ़िया अस्मिता के पहचान आय। एही तिहार मन ले हमर लोकजीवन के असली सुंदरता अऊ समृद्ध परंपरा झलकथे।


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