कागज़ों में सिमटकर रह गई छत्तीसगढ़ी भाषा, कसूरवार कौन..?

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कबीरधाम/ धनंजय चेतन साहू/ ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी/ छत्तीसगढ़ी भाषा को राजभाषा का दर्जा मिले कई वर्ष गुजर चुके हैं। बावजूद इसके सरकारी दफ्तरों सहित शिक्षा में छत्तीसगढ़ी राजभाषा को विशेष महत्व नहीं मिल रहा है। राजभाषा कागजों तक सिमट कर रह गई। स्थानीय तीज त्योहारों को भी राज्य सरकार महत्व दे रही है। छुट्टी तक का ऐलान राज्य सरकार ने किया है लेकिन छत्तीसगढ़ी भाषा, तीज त्यौहार सहित अन्य स्थानीय जानकारी किताबों से गायब है। शिक्षा से छत्तीसगढ़ की संस्कृति तीज त्यौहार अब तक दूर हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा के क्षेत्र में लगातार काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार तरुण कौशिक भी मानते हैं कि छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास के लिए सिर्फ सरकार ही जिम्मेदार नहीं है, बल्कि हम लोग भी है। सरकार ने छत्तीसगढ़ी को राजभाषा घोषित किया गया है लेकिन अब लोगों को भी इसका इस्तेमाल करना चाहिए। सरकारी कामकाज में छत्तीसगढ़ी भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए। लोग भी अपना बोलचाल छत्तीसगढ़ी भाषा में करेंगे तो इससे ज्यादा बेहतर परिणाम मिलेंगे।वहीं प्राथमिक शिक्षा में छत्तीसगढ़ी भाषा को भी जल्द शुरू किए जाने की मांग छत्तीसगढ़ी भाषा के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों ने की है। यदि शुरुआती शिक्षा के दौरान छत्तीसगढ़ी भाषा में बच्चों को पढ़ाया जाएगा तो बेहतर परिणाम देखने को मिलेंगे। यहां तक कि उन्होंने शिक्षा का माध्यम भी छत्तीसगढ़ी भाषा में किए जाने कि मांग राज्य सरकार से करते आ रहे है। और प्राथमिक कक्षाओं में एक दो पाठ छत्तीसगढ़ी भाषा में शामिल भी किया गया है लेकिन इस भाषा सरकारी स्कूलों के शिक्षक बच्चों को शिक्षा नहीं दे पा रहे हैं जो बड़ी ही दुख का विषय है। वहीं तत्कालीन कांग्रेस सरकार में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग में अध्यक्ष, सदस्य की नियुक्ति नहीं हो सकी और अभी तक वर्तमान भाजपा सरकार में भी इस आयोग में नियुक्ति नहीं होना भी बड़े ही खेद का विषय है।


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