राष्ट्रीय भाषा में नहीं सरकारी कार्यों में मातृभाषा में सूचना पटल।

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तरुण कौशिक/ संपादक/सर्वव्यापी/

केंद्र की मोदी सरकार द्वारा राष्ट्रीय भाषा हिंदी में काम काज को लेकर सख्ती बरतने की तैयारी की जा रही है जो अच्छी पहल है लेकिन देश के विभिन्न राज्यों में कुछ दिनों से राष्ट्रीय भाषा हिंदी को दरकिनार करते हुए अपनी मातृ भाषा को महत्व देने पर जंग छिड़ गई है और केंद्र सरकार की हिंदी भाषा में काम काज को लेकर विरोध भी शुरू हो गया है और विभिन्न राज्य के लोग अपनी मातृभाषा में ही काम काज, पढ़ाई-लिखाई पर जोर देते हुए इसका कड़ाई से पालन करने में लगे हुए हैं।वहीं हमारे छत्तीसगढ़ राज्य ऐसा राज्य जहां पर अब तक मातृभाषा छत्तीसगढ़ी को कोई पहचान नहीं मिल पाई है। पूर्ववर्ती रमन सरकार में छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा मिला और इस भाषा के विकास को लेकर छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का गठन भी किए गये मगर बड़े दुख की बात है कि इस आयोग के पदाधिकारियों द्वारा छत्तीसगढ़ी भाषा को बढ़ावा देने के लिए कोई विशेष कार्य नहीं किए गए। जिसके कारण आज छत्तीसगढ़ी भाषा को अपनी ही प्रदेश में पहचान की मोहताज है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों के रहवासी छत्तीसगढ़ी में बोलचाल करते हैं लेकिन लिखा पढ़ी और पढ़ाई लिखाई हिंदी भाषा में कर रहे हैं। जिसके कारण छत्तीसगढ़ के लोगों को अपनी ही भाषा की उपयोग को लेकर हिचकिचाहट हो रही है। वहीं हमारे छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्यों में जहां लोग एक तरफ अपनी राजभाषा में पढ़ाई लिखाई, बोलचाल करते हैं बल्कि तमाम सरकारी संस्थाओं , सरकारी निर्माण कार्य का सूचना पटल में जानकारी हिंदी के बजाए अपनी मातृभाषा में अंकित कर रहे हैं। जिसके कारण गैर प्रदेश के रहवासियों को पड़ोसी राज्य में काफी दिक्कत होती है । जबकि हमारी राजभाषा हिंदी की की बहन के रुप में नजर आती है क्योंकि छत्तीसगढ़ी और हिंदी भाषा मिलता-जुलता भाषा है इसलिए मेरे नजर में हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषा को भाई-बहन कहा जाए तो कोई दिक्कत नहीं होगी। निश्चित रूप से हम छत्तीसगढ़ियों को अपनी पड़ोसी राज्यों का एक बार भ्रमण करने की आवश्यकता है ताकि पता चल सके कि पड़ोसी राज्य किस तरह से अपनी राजभाषा के लिए समर्पित है और न केवल पढ़ाई लिखाई, बोलचाल बल्कि सरकारी संकेतक बोर्ड में भी राष्ट्रीय भाषा हिंदी को जगह न देकर अपनी मातृभाषा को महत्व दिए हैं।

जिसका उदाहरण महासमुंद जिले के सरायपाली से लगे उड़िसा राज्य के पडोसी गांव है, जहां पर हमारे सर्वव्यापी टीम ने देखा कि सरकारी निर्माण कार्य का सूचना पटल राष्ट्रीय भाषा हिंदी में नहीं बल्कि अपनी उड़िया भाषा में अंकित कराकर राजभाषा की महत्ता को दर्शाया है लेकिन आज हमारी राजभाषा छत्तीसगढ़ी भाषा और राष्ट्रीय भाषा हिंदी मिलता-जुलता शब्द होने के बाद भी छत्तीसगढ़ सरकार छत्तीसगढ़ी भाषा को बढ़ाने में पूरी तरह से विफल नजर आ रहे हैं।‌फिलहाल देखना है कि वर्तमान मुख्यमंत्री विष्णु देव साय अपनी राजभाषा छत्तीसगढ़ी को बढ़ावा देने में कामयाब होते हैं कि नहीं..?


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