कवर्धा/चेतन साहू / ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी/
किसी भी व्यक्ति की पहचान उसकी संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज और सबसे बढ़कर उसकी बोली से होती है। भारत के विभिन्न राज्यों में मातृभाषा न केवल बोलचाल का माध्यम है, बल्कि शिक्षा, साहित्य और सरकारी कार्यों का भी आधार बन चुकी है। लेकिन विडंबना यह है कि छत्तीसगढ़, जिसे अपनी मधुर और समृद्ध छत्तीसगढ़ी भाषा पर गर्व होना चाहिए, आज भी इसे उसका वास्तविक स्थान दिलाने में पीछे है।छत्तीसगढ़ी, जो हिंदी से मिलती-जुलती है, को वर्षों पहले राजभाषा का दर्जा मिल चुका है। बावजूद इसके, न तो इस भाषा में पढ़ाई-लिखाई हो रही है, न ही यह राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बना पाई है। पूर्व से लेकर वर्तमान तक, सरकारों की अनदेखी और ठोस पहल की कमी ने स्थिति को और कमजोर किया है।राजभाषा आयोग का गठन भी इसी उद्देश्य से हुआ था, लेकिन अब तक इसके अध्यक्ष और सदस्य केवल औपचारिक पदाधिकारियों के रूप में रह गए, जिनका कामकाज भाषा के विकास की दिशा में उल्लेखनीय नहीं रहा। नतीजतन, आयोग वेतनभोगी संस्था बनकर रह गया और छत्तीसगढ़ी भाषा की प्रगति ठहर गई।अब उम्मीदें मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से हैं कि वे इस दिशा में ठोस कदम उठाएंगे। सबसे अहम है कि राजभाषा आयोग के अध्यक्ष पद पर राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर छत्तीसगढ़ी के लिए समर्पित युवा चेहरे को जिम्मेदारी दी जाए। पूर्व सरकार की तरह उम्रदराज साहित्यकारों को केवल पद की शोभा बढ़ाने के लिए नियुक्त करने की परंपरा से बचना होगा।गौरतलब है कि आयोग में अब तक गैर-राजनीतिक और अधिकतर साहित्य जगत से जुड़े लोग ही सदस्य बने हैं, जबकि नियम में पत्रकारिता जगत से प्रतिनिधि लेने का प्रावधान भी है। ऐसे में यदि किसी युवा पत्रकार को यह जिम्मेदारी दी जाए, तो यह न केवल नई ऊर्जा और दृष्टिकोण लाएगा, बल्कि सरकार की छवि को भी सुदृढ़ करेगा।इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री को अपने भरोसेमंद अधिकारियों के साथ गंभीर चर्चा कर दूरगामी रणनीति बनानी होगी, ताकि छत्तीसगढ़ी भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर वह सम्मान मिल सके, जिसकी वह हकदार है।