तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ भाजपा में इन दिनों अजीब-सा गणित चल रहा है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का नाम तो सरकारी नोटिफिकेशन में है, लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं के दिलों में आज भी रमन सिंह ही ‘स्थायी सीएम’ माने जा रहे हैं। हालत यह है कि भाजपा के अंदरूनी महफ़िलों में लोग मजाक में कहने लगे हैं कि “साय तो सिर्फ कार्यवाहक हैं, असली मुख्यमंत्री तो विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी से ही शासन चला रहे हैं।”भाजपा संगठन के कई वरिष्ठ नेताओं का तर्क है कि विष्णुदेव साय की सरकार जमीन पर ‘साय’ यानी छाया जैसी लग रही है ,अस्तित्व है, पर रोशनी कहीं और से आ रही है। रोशनी किससे? डॉ. रमन सिंह से, जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सबसे करीबी और भरोसेमंद मित्र माना जाता है।राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा नेतृत्व एक बार फिर वही ‘पुराना कार्ड’ खेलेगा? क्या मोदी अपने परम मित्र डॉ. रमन सिंह को मुख्यमंत्री की गद्दी सौंपकर पार्टी की सियासी गाड़ी को फिर पटरी पर लगाएंगे । भाजपाइयों का कहना है कि साय साहब का शासन देखकर तो लगता है जैसे ‘डेली वेजेस’ वाला मुख्यमंत्री है, असली परमानेंट पोस्टिंग तो रमन सिंह जी की ही होगी।वहीं पार्टी के भीतर खामोश बगावत देखने को मिल रहा है।भाजपा के अंदरूनी गलियारों में चर्चा है कि संगठन का एक बड़ा वर्ग मौजूदा मुख्यमंत्री से संतुष्ट नहीं है। नाराज़गी का आलम यह है कि कई दिग्गज नेता खुले मंच पर नहीं, पर बंद कमरे में यही कहते नज़र आते हैं कि रमन के हाथों में ही पार्टी सुरक्षित है।छत्तीसगढ़ की राजनीति में यह कोई पहला मौका नहीं जब भाजपा की ‘डबल इंजन’ गाड़ी में ड्राइवर बदलने की चर्चा हो। पहले भी कई बार यह प्रयोग हुआ है और हर बार अंतिम दांव में वही नाम उभरता है, रमन सिंह। अब सवाल यह है कि क्या भाजपाईयों की यह अंदरूनी चाहत सिर्फ चर्चा तक सीमित रहेगी या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सचमुच ‘दोस्ताना’ चाल चलते हुए अपने परम मित्र को दोबारा सत्ता की गद्दी पर बैठाएंगे?