विकास नंद /सर्वव्यापी/
भारत निर्वाचन आयोग ने एक बार फिर “विशेष गहन पुनरीक्षण 2026” की घोषणा की है। हर बार की तरह इस बार भी कागज, फॉर्म और बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। सवाल यह है कि क्या वास्तव में मतदाता सूची को पारदर्शी और शुद्ध बनाया जाएगा, या फिर यह प्रक्रिया सिर्फ सरकारी फाइलों को मोटा करने का जरिया बनेगी?
कलेक्टर संजय अग्रवाल की अगुवाई में हुई बैठक में कांग्रेस, भाजपा, आम आदमी पार्टी, बसपा, माकपा और जनता कांग्रेस (जे) के प्रतिनिधि शामिल हुए।
हालांकि, चर्चा के केंद्र में लोकतंत्र की मजबूती कम और दलों का वोट बैंक ज्यादा रहा।
आयोग का दावा है कि बीएलओ, पंजीकरण अधिकारी और बूथ लेवल एजेंट मिलकर मतदाता सूची को दुरुस्त करेंगे। लेकिन जनता को अनुभव है कि हर बार मृतकों के नाम सूची में बने रहते हैं, फर्जी वोटर सक्रिय रहते हैं और असली मतदाता पहचान साबित करने में घंटों लाइन में खड़े रहते हैं।असल में, दिल्ली और आयोग की यह कवायद लोकतंत्र को व्यवस्थित करने से ज्यादा जनता को व्यस्त रखने का तरीका बन गई है।
ऊपर से पारदर्शिता का दिखावा होता है और जमीनी स्तर पर पुराना खेल जारी रहता है।लोकतंत्र की मजबूती के लिए ज़रूरी है कि यह रस्म अदायगी असली सुधार में बदली जाए। आधार और मतदाता पहचान पत्र का पूर्ण मिलान, मृतकों के नाम स्वतः हटाना और पूरी प्रक्रिया को डिजिटल पारदर्शिता से जोड़ना ही इसका समाधान हो सकता है।
वरना हर पाँच साल बाद यह प्रक्रिया “विशेष गहन पुनरीक्षण” नहीं बल्कि “विशेष गहन पुनरावृत्ति” बनकर रह जाएगी, जिसमें जनता लोकतंत्र के नाम पर फॉर्म भरने में उलझी रहेगी और राजनीति अपनी चाल चलती रहेगी।