तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ के एक जिले में नगर सेना और अग्निशमन विभाग का हाल देखकर कोई भी दंग रह सकता है। विभाग का हाल इन दिनों ऐसा है मानो “सेवा” शब्द को बदलकर “सेटिंग” कर दिया गया हो। आधा दर्जन से अधिक होमगार्ड जवान विभागीय ड्यूटी पर तो दर्ज होते हैं, लेकिन हकीकत में वे या तो अपनी दुकान संभाल रहे हैं, या फिर निजी व्यवसाय में व्यस्त रहते हैं।विभागीय सूत्रों की मानें तो यह सब कुछ जिला सेनानी (नगर सेना) एवं अग्निशमन यंत्र अधिकारी की ‘अदृश्य छत्रछाया’ में संभव हो रहा है। बताया जाता है कि जवान सुबह विभागीय उपस्थिति रजिस्टर में हस्ताक्षर कर आते हैं और फिर दिनभर अपनी ऑटो पार्ट्स की दुकान या बस संचालन में लग जाते हैं। ड्यूटी पर तैनाती कागजों में दर्ज होती है, लेकिन मौके पर न जवान मिलते हैं और न ही वर्दी का नामोनिशान।लोगों का कहना है कि शहर में जब भी अग्निशमन या आपदा जैसी घटनाएं होती हैं, तब जवानों की गुमशुदगी सबसे बड़ा सवाल बन जाती है। मौके पर पहुंचने के बजाय जवानों को उनकी दुकान या अन्य धंधे में व्यस्त पाया जाता है।सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि इन जवानों की जेब हर महीने सरकारी वेतन से भरी रहती है। विभागीय सूत्रों का आरोप है कि जवानों को घर बैठे वेतन दिलाने के एवज में जिला कमांडेंट को हर महीने “नियमित कमीशन” भी चढ़ाया जाता है। यानी सरकारी सिस्टम में कर्तव्य की जगह कमीशन और कनेक्शन का खेल चलता है।कुछ जवानों का कहना है कि विभाग में यह कोई नई परंपरा नहीं है, बल्कि सालों से यही सिस्टम चला आ रहा है। फर्क बस इतना है कि अब जवानों ने इसे “प्रोफेशनल बिजनेस मॉडल” बना लिया है। कहीं दुकान, कहीं बस, कहीं ठेका ,सब तरफ जवानों का धंधा फल-फूल रहा है, और सरकारी खजाने से तनख्वाह भी बेरोकटोक मिल रही है। शहरवासियों का तंज है कि जिला प्रशासन को चाहिए कि होमगार्ड जवानों को विभागीय ड्यूटी से हटाकर सीधे एमएसएमई विभाग के अंतर्गत पंजीकृत कर दिया जाए, ताकि वे बाकायदा ‘उद्यमी’ कहलाएं। यही है कि जब वर्दी ‘कर्तव्य’ की पहचान न रहकर ‘कमाई’ की गारंटी बन जाए, तो फिर जनता को सुरक्षा से ज्यादा सिर्फ तमाशा ही मिलेगा।