तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
बिलासपुर कलेक्टर संजय अग्रवाल ने तहसीलदार और नायब तहसीलदारों का स्थानांतरण आदेश जारी किया और आदेश निकलते ही प्रशासनिक गलियारों से लेकर चाय की दुकानों तक एक ही सवाल तैरने लगा कि ये प्रमोशन है या डिमोशन?
इस तबादला आदेश में सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी पचपेड़ी तहसील के तहसीलदार प्रकाश चंद साहू ने। साहू साहब को सीधे जिले की न्यायधानी कहे जाने वाले बिलासपुर तहसीलदार की कुर्सी सौंप दी गई। इसे लोग एक तरह से “सीधी छलांग” मान रहे हैं।लेकिन असली चर्चा का मुद्दा बनीं बिलासपुर तहसील की मौजूदा तहसीलदार गरिमा ठाकुर। आदेश में उन्हें बिलासपुर में ही रखते हुए “अतिरिक्त तहसीलदार” बना दिया गया है। अब सवाल यह है कि गरिमा का यह पदोन्नति है या पदावनति?अगर गरिमा को ही बदलना था, तो उन्हें किसी और तहसील में तहसीलदार बनाकर भेजा जा सकता था। पर कलेक्टर साहब ने ऐसा फैसला क्यों लिया?
यह प्रशासनिक बुद्धिमत्ता है या राजनीतिक समीकरणों का परिणाम, यह तो वही बेहतर जानते होंगे।बिलासपुर प्रशासन में अब नई पहेली गूंजी है – “तहसीलदार गरिमा अब अतिरिक्त तहसीलदार, तो अतिरिक्त का मतलब ज्यादा जिम्मेदारी या कम अधिकार?” आदेश देखकर कई लोग कह रहे हैं कि यह प्रमोशन भी है और डिमोशन भी, समझने वाला समझे! कुछ नौकरशाही जानकारों का कहना है कि यह फैसला प्रशासनिक प्रयोग जैसा है, जिसमें गरिमा को न हटाया गया, न पूरी तरह रखा गया। मानो ‘न घर के, न घाट के’।
बिलासपुर के इस तबादले पर सियासी गलियारों में भी फुसफुसाहट शुरू हो गई है। लोग तंज कस रहे हैं कि कलेक्टर साहब ने नया गणित इजाद कर दिया है – प्रमोशन और डिमोशन दोनों को एक ही आदेश में फिट करना!
कुछ लोगों का मानना है कि यह सिर्फ प्रशासनिक मजबूरी नहीं, बल्कि दबाव और खींचतान का भी नतीजा है। अब पूरा बिलासपुर यह जानने को बेताब है कि गरिमा ठाकुर की नई पोस्टिंग को आखिर किस नजरिए से देखा जाए।
फिलहाल जनता और कर्मचारी एक ही लाइन बोल रहे हैं कि “कलेक्टर साहब, यह प्रमोशन है या डिमोशन, हमें भी समझा दीजिए!”


