तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
दशहरा पर्व पर जब पूरा प्रदेश उत्सव की उमंग में डूबा हुआ है, तब बिलासपुर जिले सहित अन्य जिलों के हजारों शिक्षक अपनी छुट्टियों का त्याग कर जिला प्रशासन के आदेश पर मतदाता पुनरीक्षण कार्य में झोंके जा रहे हैं। शिक्षकों के लिए न तो त्योहार मायने रख रहा है, न ही पारिवारिक जिम्मेदारियाँ। आदेश की तलवार ऐसी लटक रही है कि छुट्टी के दिन भी उन्हें घर–परिवार छोड़कर फील्ड में पसीना बहाना पड़ रहा है।शिक्षक संगठनों की चुप्पी भी शिक्षकों के घावों पर नमक छिड़क रही है। जिन संगठनों को आवाज बुलंद करनी चाहिए थी, वे इस पूरे मामले पर मौन साधे बैठे हैं। परिणाम यह है कि शिक्षक मजबूरी में दोहरी भूमिका निभा रहे हैं।एक ओर शिक्षा की जिम्मेदारी और दूसरी ओर प्रशासनिक आदेशों का निर्वहन।बिलासपुर के कुछ विरोध जताने वाले शिक्षकों का कहना है कि प्रशासन को मतदाता पुनरीक्षण जैसे कार्यों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए। छुट्टी पर अधिकार हर कर्मचारी का है, लेकिन हमें लगातार बोझिल जिम्मेदारियों से बांधा जा रहा है।यह स्थिति सिर्फ दशहरा तक सीमित नहीं है। चुनावी साल आते ही शिक्षकों पर अतिरिक्त काम का बोझ और बढ़ जाता है। कभी मतदाता सूची, कभी सर्वे, तो कभी जनगणना। हर बार सबसे आसान शिकार शिक्षक ही बनाए जाते हैं। क्या शिक्षक शिक्षा देने के लिए हैं या हर प्रशासनिक काम की जिम्मेदारी उठाने के लिए? त्योहारों की छुट्टी में भी जब उन्हें राहत न मिले तो शिक्षा की गुणवत्ता पर क्या असर पड़ेगा? जिला प्रशासन के आदेश और संगठन की चुप्पी ने शिक्षकों को इस कदर निराश कर दिया है कि अब वे इसे “त्योहारों का अतिरिक्त होमवर्क” मानने लगे हैं।


