तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ मं राजभाषा आयोग बर बरसों ले चर्चा चलत हावे, फेर हर बखत नियुक्ति के नाम पर राजनीति अउ समझौता के पेंच फंस जाथे। हमर मातृभाषा छत्तीसगढ़ी के मान-सम्मान बर बनई गे आयोग अब तक सिरिफ कुर्सी वितरण के ठेहा बने के साधन बन के रहि गे हावे।सवाल हे कि आखिर कब तक छत्तीसगढ़ी भाखा के भाग्य उमरदराज़ साहित्यकार मन के “संरक्षक छांव” मं दबा रहिही? का नवा सोच, नवा उमंग, नवा जोश वाले युवा पत्रकार अउ साहित्यकार मन ला अपन भाखा बर लड़ई करे बर मंच नई मिलही?आज के समय मं भाखा सिरिफ किताब के पन्ना मं घलो नई रहि सकय, ओकर विस्तार इंटरनेट, अखबार, सोशल मीडिया अउ मंचन तक जरूरी हे। फेर, आयोग के कुर्सी मं बैठे मनखे मन आज घलो पुराना ढंग ले भाखा के सीमित कर देथें।युवा मन के ऊर्जावान कलम, ताजगी से भरपूर लेखनी अउ डिजिटल सोच के जरुरत राजभाषा आयोग मं हे।ए बात सच हे कि उमर अउ अनुभव के अपन महत्त्ता हावे, फेर अनुभव अउ नवा सोच के मेल लेच भविष्य बनथे। सिरिफ परंपरा के नाम मं कुर्सी बांटई जाही, त छत्तीसगढ़ी भाखा के पहिचान घलो “भूतकाल” के गोद मं अटक जाही।अब जरूरत हे के छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग मं युवा पत्रकार अउ साहित्यकार मन ला प्रतिनिधित्व मिले। आयोग ला पारदर्शी अउ जिम्मेदार मंच बनाय जावय।छत्तीसगढ़ी भाखा बर ठोस योजना बने – शिक्षा, मीडिया, सरकारी कामकाज अउ रोज़मर्रा के व्यवहार मं अपन भाखा के हक मिलय। युवा पीढ़ी ला भरोसा हे कि छत्तीसगढ़ी सिरिफ घर-गांव मं बोले जाने वाली बोली नई, ये त हमर असली अस्मिता हावे। राजभाषा आयोग उमरदराज़ मन ला सम्मान दे, फेर भविष्य के जिम्मेदारी ला नवा पीढ़ी के कंधा मं घलो रखय। काबर “भाखा ला बचाय बर नवा सोच अउ नवा कलम जरूरी हे ” नइ त छत्तीसगढ़ी के सपना घलो आयोग के कुर्सी संग उमरदराज़ हो जाही।आघू छत्तीसगढ़ के मुखिया विष्णु देव साय अऊ छत्तीसगढ़ी ल राजभाषा बनावाईया पूर्व मुखिया वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष डॉ रमन सिंह जानय काय ए दिशा मं कर ही…?


