तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार बने पौने दो साल का वक्त बीत चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने प्रदेश में पार्टी की सत्ता बचाने और संगठन को सशक्त करने की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह (जो छाया मुख्यमंत्री की तरह सक्रिय हैं), प्रदेशाध्यक्ष किरण सिंह देव, संगठन महामंत्री पवन साय, मुख्यमंत्री के सलाहकार झा और प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह को सौंपी थी।लेकिन आज तक प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल यही है, नियुक्तियाँ आखिर होंगी कब?पहले कहा गया – मंत्रिमंडल विस्तार के बाद होगा, फिर टाल दिया गया – नवरात्रि में होगा, अब दशहरा भी बीत गया और नियुक्तियों की फाइलें अब तक टेबल से हिली तक नहीं।संसदीय सचिवों की सूची अधर में है।निगम-मंडल, आयोग-बोर्ड की कुर्सियाँ खाली पड़ी हैं। सहकारी बैंकों और एल्डरमेन की नियुक्तियाँ कागज़ों में ही दब गई हैं। और दावेदार नेताओं-कार्यकर्ताओं की उम्मीदें अब धूल फाँक रही हैं।इस स्थिति से भाजपा कार्यकर्ता और दावेदार नेता अब भीतर ही भीतर नाराज़ हैं। उनका उत्साह ठंडा पड़ चुका है और सवाल उठ रहे हैं कि जब अनुशासित पार्टी में भी मेहनत का इनाम सिर्फ आश्वासन हो तो क्या यह कार्यकर्ताओं के साथ धोखा नहीं?स्थिति इतनी विकट हो गई कि भाजपा के वरिष्ठ आदिवासी नेता और पूर्व मंत्री ननकी राम कंवर को अपनी ही सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करना पड़ा, केवल इसलिए कि वे एक कलेक्टर को हटाना चाहते थे।अब सवाल सीधे-सीधे मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और केंद्र के नेताओं से है , क्या वे नियुक्तियों को लेकर गंभीर हैं या केवल तारीखें बदलकर कार्यकर्ताओं को भरमाते रहेंगे? क्या संगठन की मजबूती के नाम पर सिर्फ भाषण और अनुशासन ही दिखाना काफी है? क्या पौने दो साल का इंतजार कार्यकर्ताओं की निष्ठा और धैर्य की परीक्षा बन चुका है?भाजपा को “अनुशासित पार्टी” कहा जाता है, लेकिन जब अनुशासन के नाम पर कार्यकर्ताओं की आवाज दबा दी जाए और नियुक्तियों की आस बुझा दी जाए, तो यह अनुशासन नहीं बल्कि लापरवाही कहलाती है।ऐसे हालात में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या छत्तीसगढ़ भाजपा का जहाज़ संगठनात्मक उपेक्षा और सरकार की सुस्ती से ही डगमगाएगा, या फिर प्रधानमंत्री और केंद्रीय नेतृत्व सचमुच इस मुद्दे को गंभीरता से लेंगे?


