नियुक्तियों पर अड़ंगा या आर्थिक मजबूरी? साय सरकार की उलझन ने खोला सत्ता संतुलन का पन्ना - Sarvavyapi नियुक्तियों पर अड़ंगा या आर्थिक मजबूरी? साय सरकार की उलझन ने खोला सत्ता संतुलन का पन्ना - Sarvavyapi

नियुक्तियों पर अड़ंगा या आर्थिक मजबूरी? साय सरकार की उलझन ने खोला सत्ता संतुलन का पन्ना

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कबीरधाम/ धनंजय चेतन साहू/ ब्यूरो चीफ/

छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार बने लगभग दस माह का वक्त गुजर चुका है। सत्ता के शुरुआती महीनों में ही अप्रैल 2025 में मुख्यमंत्री ने 36 निगम, मंडल, आयोग और बोर्ड में नियुक्तियों की घोषणा कर दी थी, लेकिन आज पांच महीने बीतने के बाद भी शेष बचे कई महत्वपूर्ण पद खाली पड़े हैं। इनमें संसदीय सचिवों की नियुक्ति, जिला सहकारी केन्द्रीय बैंकों के संचालक मंडल, एल्डरमेन सहित अन्य राजनीतिक पद शामिल हैं।सूत्र बताते हैं कि इन लंबित नियुक्तियों के पीछे सरकार की आंतरिक खींचतान और वित्तीय संकट दोनों की बड़ी भूमिका है। वित्त मंत्री ओमप्रकाश चौधरी लगातार यह तर्क देते नजर आ रहे हैं कि वर्तमान में राज्य की आर्थिक स्थिति नियुक्तियों के लिए अतिरिक्त बजट की अनुमति नहीं देती। सरकार की प्राथमिकता फिलहाल महतारी वंदन योजना को नियमित भुगतान सुनिश्चित करना है, जिस पर ही राज्य का बड़ा हिस्सा खर्च हो रहा है।यह स्थिति सत्ता के भीतर संतुलन और खींचतान को उजागर करती है। एक ओर भाजपा संगठन और सत्ता में भागीदारी की अपेक्षा रखने वाले कार्यकर्ता-नेता नियुक्तियों के इंतजार में हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार की आर्थिक विवशता और मंत्रिमंडल के भीतर विरोधाभासी विचारधाराएँ इस प्रक्रिया को रोक रही हैं।राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि लगातार टलती नियुक्तियाँ न केवल कार्यकर्ताओं की नाराजगी बढ़ा रही हैं बल्कि विपक्ष को भी सरकार की “आर्थिक कमजोरी और असमंजस” को लेकर हमलावर होने का मौका दे रही हैं। सवाल यह है कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय संगठनात्मक दबाव और वित्तीय अड़चनों के बीच किस ओर झुकाव दिखाते हैं।आखिरकार, यह विवाद सिर्फ नियुक्तियों का नहीं बल्कि सत्ता संचालन की दिशा तय करने वाला मुद्दा बन चुका है। यदि समय रहते संतुलन नहीं साधा गया, तो भाजपा सरकार के लिए संगठन और सत्ता दोनों के समीकरण बिगड़ सकते हैं।


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