भागवत प्रसाद/ ब्यूरोचीफ/ सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की पहचान और अस्मिता की धड़कन मानी जाने वाली छत्तीसगढ़ी भाषा एक बार फिर सियासी उपेक्षा की शिकार होती नजर आ रही है।पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपने तीन कार्यकाल के दौरान छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा तो दिया, मगर भाषा आयोग की बागडोर हमेशा उम्रदराज साहित्यकारों और वह भी मुख्य रूप से एक ही समाज के लोगों को सौंपते रहे। इसके बाद कांग्रेस सरकार आई और पांच साल तक भूपेश बघेल ने आयोग की कुर्सी खाली ही रखी।अब भाजपा की वापसी के बाद भी हालात जस के तस हैं। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के पौने दो साल के कार्यकाल में भी न तो अध्यक्ष की नियुक्ति हुई और न ही सदस्यों की। सवाल यह उठ रहा है कि जब खुद मुख्यमंत्री और उनके सहयोगी उपमुख्यमंत्री अरुण साव, विजय शर्मा व वित्त मंत्री ओमप्रकाश चौधरी छत्तीसगढ़िया हैं, तो आखिर छत्तीसगढ़ी भाषा के भविष्य को लेकर इतनी बेरुखी क्यों?सूत्र बताते हैं कि सरकार को अब तक पचासों दावेदारों के बीच कोई “योग्य” उम्मीदवार नजर नहीं आया। मगर आलोचकों का कहना है कि सच्चाई यह है कि सरकार छत्तीसगढ़ी भाषा को दरकिनार कर रही है। यही कारण है कि राजभाषा आयोग का गठन अब भी अधर में लटका हुआ है।जनभावना यही कह रही है – अगर सत्ता ही अपनी मातृभाषा को बचाने के लिए आगे नहीं आएगी, तो छत्तीसगढ़ी कहीं इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह जाएगी।


