रामानंद त्रिपाठी, रामेश्वर शर्मा, दुर्गा प्रसाद पारकर और परदेशी राम वर्मा पर फिर अध्यक्ष पद की दौड़ में बढ़ा दबाव, रितुराज साहू जैसे युवा चेहरे भी मैदान में। - Sarvavyapi रामानंद त्रिपाठी, रामेश्वर शर्मा, दुर्गा प्रसाद पारकर और परदेशी राम वर्मा पर फिर अध्यक्ष पद की दौड़ में बढ़ा दबाव, रितुराज साहू जैसे युवा चेहरे भी मैदान में। - Sarvavyapi

रामानंद त्रिपाठी, रामेश्वर शर्मा, दुर्गा प्रसाद पारकर और परदेशी राम वर्मा पर फिर अध्यक्ष पद की दौड़ में बढ़ा दबाव, रितुराज साहू जैसे युवा चेहरे भी मैदान में।

Share Now

कबीरधाम/ चेतन साहू/ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष पद को लेकर एक बार फिर पुराने और नए विचारों की टक्कर सामने आ गई है। उम्रदराज साहित्यकारों ने एक बार फिर इस पद पर कब्जे की कोशिशें तेज कर दी हैं, वहीं अब युवा वर्ग खुलकर नई सोच और नई ऊर्जा के साथ अपनी दावेदारी पेश कर रहा है।सूत्रों के अनुसार, वरिष्ठ साहित्यकारो ने इस आयोग में अध्यक्ष पद पर रामानंद त्रिपाठी, रामेश्वर शर्मा, दुर्गा प्रसाद पारकर और परदेशी राम वर्मा के हाथों में से किसी एक को सौंपने के लिए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से लेकर विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह, स्कूल शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव और दुर्ग सांसद विजय बघेल तक से वरिष्ठ साहित्यकारों ने मुलाकात कर आयोग का नेतृत्व उक्त उम्रदराजों साहित्यकारों के हाथ में देने की मांग की है।वहीं दूसरी ओर, बिलासपुर के बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला के बड़े पिता 85 वर्षीय नंदकिशोर शुक्ला लंबे समय से छत्तीसगढ़ी राजभाषा मंच के माध्यम से भाषा के सम्मान के लिए संघर्षरत हैं। साथ ही, रायपुर निवासी छत्तीसगढ़ी एम.ए. डिग्रीधारी छात्र संगठन के प्रदेशाध्यक्ष रितुराज साहू जैसे युवा चेहरे अब इस पद के लिए गंभीर दावेदारी पेश कर रहे हैं। रितुराज लंबे समय से छात्र संगठनों और भाषा आंदोलनों के माध्यम से युवाओं को जोड़ते आ रहे हैं।युवा वर्ग का कहना है कि सात सालों से बिना अध्यक्ष के चल रहे इस आयोग को अब नई दिशा, गतिशील नेतृत्व और छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए ठोस पहल की जरूरत है। सचिव स्तर पर सीमित होकर रह गया आयोग अब तक न तो राज्य स्तर पर अपनी पकड़ बना पाया है, न ही राष्ट्रीय स्तर पर कोई पहचान।छत्तीसगढ़ की असली पहचान उसकी भाषा और लोक-संस्कृति में बसती है। राज्य के गठन के बाद यह उम्मीद थी कि छत्तीसगढ़ी भाषा को शासन और जनता दोनों के बीच समान सम्मान मिलेगा। लेकिन अफसोस की बात है कि राजभाषा आयोग जैसे महत्वपूर्ण संस्थान का नेतृत्व लंबे समय से उम्रदराज और लगभग एक ही विचारधारा के साहित्यकारों के हाथों में रहा है।अब समय आ गया है कि इस परंपरा को बदला जाए। आयोग को ऐसी नई नेतृत्वशैली की जरूरत है, जो भाषा को सीधे जनता तक पहुंचा सके, जो किसान, महिला, युवा और आम जन से संवाद स्थापित कर सके। भाषा किसी जाति या वर्ग की नहीं होती, यह तो जनता की आत्मा होती है।यदि सरकार सचमुच भाषा को जीवित और सशक्त बनाए रखना चाहती है, तो उसे ऐसे लोगों को आगे लाना होगा जो भाषा को तकनीक, शिक्षा और समाज से जोड़ सकें। राजभाषा आयोग अब अतीत का संग्रहालय नहीं, बल्कि भविष्य की प्रयोगशाला बनना चाहिए। भाषा का लोकतंत्रीकरण तभी संभव है जब इसमें युवा और विविध समाज के प्रतिनिधियों की भागीदारी सुनिश्चित हो और यही आज की सबसे बड़ी जरूरत है। सर्वव्यापी लगातार इस विषय को प्रमुखता से उठाता रहा है। अब सबकी निगाहें मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की ओर हैं कि दशहरे से पहले क्या वे इस आयोग को नई पीढ़ी की सोच से जोड़ने का साहसिक निर्णय ले पाएंगे।


Share Now

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You cannot copy content of this page

error: Content is protected !!