विकास नंद/ सर्वव्यापी/
राज्य की नौकरशाही और राजनीति के बीच खींचतान का सिलसिला एक बार फिर चर्चा में है। पिछले शासनकाल में कई आईएएस अधिकारियों को भ्रष्टाचार के मामलों में बली का बकरा बनाया गया, जबकि आरोपों की जड़ में शीर्ष स्तर के राजनीतिक निर्णय रहे। सत्ता परिवर्तन के बाद अब अधिकारी वर्ग पहले से अधिक सतर्क हो गया है। पिछले अनुभवों से सीख लेते हुए वर्तमान सरकार में अधिकारी अब हर कार्य में नियम और कानून को आधार बना रहे हैं, ताकि भविष्य में उन पर अनावश्यक आरोप न लग सकें।लेकिन इसी सख्ती को लेकर अब उन पर “अफसरशाही” का ठप्पा लगाया जा रहा है। नेताओं और कुछ जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि अधिकारी जनता की समस्याओं पर लचीला रुख नहीं अपनाते और फाइलों में उलझाकर कामों में देरी कर रहे हैं। वहीं अधिकारी वर्ग का कहना है कि वे अब नियमों की अनदेखी नहीं कर सकते, क्योंकि पिछली सरकार में नियमों से समझौता करने का खामियाजा कई ईमानदार अफसरों को भुगतना पड़ा है।इस स्थिति में सवाल यह उठता है कि क्या अधिकारी नियम-कायदों की अवहेलना कर राजनीतिक दबाव में कार्य करें या फिर जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए, लेकिन कानून के दायरे में रहकर, काम करें? शासन-प्रशासन की पारदर्शिता और जवाबदेही के इस दौर में यह बहस और भी गंभीर हो गई है।विशेषज्ञों का मानना है कि नीति और नीयत दोनों स्पष्ट होनी चाहिए। यदि सरकार और प्रशासन एक-दूसरे के पूरक बनें, तो न केवल विकास कार्यों की गति तेज़ होगी बल्कि जनता का विश्वास भी कायम रहेगा। वर्तमान परिदृश्य में यह संतुलन ही सुशासन की कसौटी बनेगा।


