तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
“गर्व ले कहव – हमन छत्तीसगढ़िया हन!”ए बात सिरिफ एक ठन नारा नइये, ए हमर अस्मिता के धड़कन आय। हमर बोली, हमर माटी, हमर मेहनत, एहीच हवय असली छत्तीसगढ़ के पहिचान। खेती-बाड़ी हमर शान आय, अऊ धान के कटोरा कहे जाय वाला ये धरती अपन श्रम, संस्कार अऊ सादगी ले दुनियाभर मं अपन नाम रोशन कर दे हे।छत्तीसगढ़ के चउर अब विदेश मं घलो पहुंचत हे, अऊ हमर किसान, मजदूर अऊ कारीगर अपन मेहनत अऊ ईमानदारी ले देश-विदेश मं जाने जाथें।ए धरती मं इंसानियत सबसे बड़का धर्म आय।इहां जात-पात के भेद नइ, सबो झन एक-दूसर ला “भाई” कहिथें।बिहार, उड़ीसा, झारखंड, यूपी, महाराष्ट्र, बंगाल अऊ देश के कोने-कोने ले आय लोगन अपन रिवाज, अपन बोली ले रहिथें, फेर छत्तीसगढ़ी अपनापन सबो मनखे के दिल मं बस गे हे।यहीच हवय असली “छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” के भावना।फेर अब सवाल उठथे का हमन अपन भाषा अऊ अपन पहिचान ला सच मं ओतके मान देथन जेतका देव बर चाही?राज्य बने ला अब पचिस बरिस होगे,फेर घलो हमर छत्तीसगढ़ी भाषा आज घलो शासन-प्रशासन के हाशिया मं आय।राजभाषा आयोग के सीमित कामकाज अऊ सरकार मन के अनदेखी ले हमर भाषा सिरिफ एक ठन औपचारिक गोठ बन के रह गे हवय।अब बखत आय गे हे के हमन अपन मातृभाषा के जिम्मेदारी खुदे उठावन।घर-परिवार, स्कूल-कालेज, दफ्तर अऊ रोज के गोठ-बात मं छत्तीसगढ़ी बोलना, लिखना अऊ पढ़ना ला अपन बानी बनावन।एहीच हवय हमर असली गौरव के रद्दा।जतका बखत तक हमन खुद अपन भाषा ला मान नइ देबो, ततक कोनो आयोग, कोनो सरकार ओकर उन्नति नइ कर सके।छत्तीसगढ़ के पहिचान सिरिफ ओकर माटी या धान के खेत ले नइ बनथे ,ओकर आत्मा त छत्तीसगढ़ी भाषा मं बसत हे।त आय, फेर ले अपन मन मं ए संकल्प जगावन “हमर बोली हमर गोंठ, हमर छत्तीसगढ़ हमर ठाठ।”


