राज्यपाल या मुख्यमंत्री? संवैधानिक मर्यादाओं पर उठ रहे सवाल। - Sarvavyapi राज्यपाल या मुख्यमंत्री? संवैधानिक मर्यादाओं पर उठ रहे सवाल। - Sarvavyapi

राज्यपाल या मुख्यमंत्री? संवैधानिक मर्यादाओं पर उठ रहे सवाल।

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तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों एक असामान्य दृश्य देखने को मिल रहा है। राज्यपाल रमेन डेका प्रदेश के जिलों का लगातार दौरा कर रहे हैं, प्रशासनिक अधिकारियों से बैठक ले रहे हैं, विकास कार्यों की समीक्षा कर रहे हैं और सीधे अधिकारियों को निर्देश भी दे रहे हैं। यह सब कुछ किसी सक्रिय मुख्यमंत्री या मंत्री जैसा लग रहा है, न कि एक संवैधानिक रूप से मर्यादित राज्यपाल की भूमिका जैसा।राज्यपाल, भारतीय संविधान के अनुसार, राज्य के मुख्य कार्यपालक प्रमुख होते हैं, परंतु यह भूमिका मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर आधारित होती है। संविधान की भावना स्पष्ट कहती है कि राज्यपाल किसी भी प्रशासनिक कार्य में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं कर सकते। उनकी भूमिका परामर्श, अनुशंसा और निगरानी तक सीमित है। लेकिन हाल के दिनों में रमेन डेका का दौरा कार्यक्रम कुछ और कहानी बयां कर रहा है।इस सप्ताह राज्यपाल रमेन डेका मुंगेली, कोरबा, अंबिकापुर, बलरामपुर, सूरजपुर, कोरिया और गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिलों में राज्यपाल द्वारा लिए गए प्रशासनिक समीक्षा बैठकें इस सवाल को जन्म दे रही हैं कि क्या यह संविधान की भावना के विपरीत नहीं है?मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की मौजूदगी में राज्यपाल का इस तरह से प्रशासनिक मोर्चे पर सक्रिय होना कहीं दोहरी सत्ता केंद्र की स्थिति तो नहीं बना रहा?यही नहीं राज्यपाल राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति (Chancellor) हैं। विश्वविद्यालयों में अकादमिक और प्रशासनिक संकट लंबे समय से बने हुए हैं। कुलपतियों की नियुक्तियाँ अटकी हैं, परीक्षाओं में देरी है, और शिक्षा गुणवत्ता पर प्रश्नचिन्ह हैं। इन बुनियादी दायित्वों की ओर ध्यान न देकर जब राज्यपाल जिलों की समीक्षा बैठकें ले रहे हैं, तब यह प्रश्न और भी तीखा हो जाता है कि आखिर प्राथमिकता किस दिशा में है ,शिक्षा सुधार या प्रशासनिक प्रभुत्व?वहीं मुख्यमंत्री कार्यालय और राजभवन दोनों ही इस पर सार्वजनिक रूप से चुप हैं। न सरकार ने राज्यपाल की इस सक्रियता पर कोई औपचारिक टिप्पणी की है, न ही राजभवन ने इन बैठकों की संवैधानिक सीमा स्पष्ट की है। इससे यह धारणा बन रही है कि प्रदेश में अब संवैधानिक भूमिकाओं की सीमाएँ धुंधली होती जा रही हैं।वहीं संवैधानिक मामलों के जानकार मानते हैं कि राज्यपाल का प्रशासनिक समीक्षा करना राज्य सरकार की जवाबदेही की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। संविधान में स्पष्ट है कि राज्यपाल केवल उन्हीं मामलों में हस्तक्षेप कर सकते हैं, जो केंद्र सरकार के परामर्श या रिपोर्ट से संबंधित हों, न कि रोज़मर्रा के प्रशासनिक निर्णयों में।राज्यपाल रमेन डेका की सक्रियता को कुछ लोग राज्य में प्रशासनिक अनुशासन लाने की पहल बता रहे हैं, तो कुछ इसे संवैधानिक मर्यादा से परे राजनीतिक सक्रियता मान रहे हैं।जो भी हो, छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि एक राज्यपाल इस स्तर पर जिलों का दौरा कर प्रशासनिक समीक्षा में जुटे हैं और यह परंपरा आने वाले समय में संविधान बनाम व्यवहार की नई बहस को जन्म दे सकती है।


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