तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग, जो राज्य की पहचान और अस्मिता “छत्तीसगढ़ी” भाषा के संवर्धन के लिए गठित किया गया था, वह इन दिनों खुद “भाषा की राजनीति” का शिकार बना हुआ है। आयोग की कमान भले ही पदेन रूप से मुख्यमंत्री के पास हो, परंतु वास्तविकता यह है कि आयोग महीनों से अध्यक्षविहीन अवस्था में है।इस बीच, आयोग में प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ सचिव अभिलाषा बेहार ने “राजभाषा के प्रचार-प्रसार” का बीड़ा अपने कंधों पर उठा लिया है। वे राज्य के विभिन्न कलेक्टर कार्यालयों में छत्तीसगढ़ी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करवा रही हैं, ताकि सरकारी कामकाज में मातृभाषा की उपस्थिति सशक्त हो सके।पर सवाल यह है—जब खुद “राजभाषा आयोग” का स्वर मौन है, तो प्रशिक्षण का “सुर” कितना गूंज पाएगा?सूत्र बताते हैं कि कई जिलों में प्रशिक्षण को लेकर उत्साह तो दिख रहा है, पर आयोग के “स्थायी नेतृत्व” के अभाव में योजनाओं की निरंतरता पर प्रश्नचिह्न लगा हुआ है।राजभाषा आयोग की स्थापना छत्तीसगढ़ी और अन्य स्थानीय भाषाओं के संरक्षण, नीति निर्माण और उनके प्रशासनिक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। लेकिन वर्तमान में अध्यक्ष की नियुक्ति न होने से आयोग की सक्रियता आधी रह गई है।छत्तीसगढ़ी में कहा भी गया है कि घोड़ा बिन सारथी के, रथ कइसे दौड़ही!यानी, सचिव अभिलाषा बेहार चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, आयोग को दिशा देने वाला नेतृत्व न होने के कारण प्रयासों की गूंज अधूरी ही रह जाएगी।अब देखने वाली बात यह है कि मुख्यमंत्री, जो आयोग के पदेन अध्यक्ष हैं, क्या इस “भाषायी रिक्ति” को जल्द भरते हैं—या फिर राजभाषा आयोग छत्तीसगढ़ी में ही कहेगा, “हमन त अपन भाखा बर लड़त हन, पर नेता मन मौन हंवय!”


