के.एस.ठाकुर/कार्यकारी संपादक/ सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार के मुखिया विष्णु देव साय एक ओर प्रदेश में “सबका साथ, सबका विकास” का नारा बुलंद कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बिलासपुर संभाग के कुर्मी समाज के वरिष्ठ और युवा कार्यकर्ता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। समाज का आरोप है कि भाजपा संगठन से लेकर शासन के तमाम मंडल–निगम–आयोग तक, कहीं भी बिलासपुर संभाग के कुर्मी नेताओं को प्रतिनिधित्व नहीं मिला है।कुर्मी समाज के कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह स्थिति न केवल निराशाजनक है, बल्कि समाज की वर्षों की राजनीतिक निष्ठा के साथ अन्याय भी है। कुर्मी समाज के वरिष्ठ सामाजिक नेताओं का कहना है कि बिलासपुर संभाग में भाजपा के साथ जुड़े कुर्मी समाज के वरिष्ठ और युवा कार्यकर्ताओं की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन सरकार ने संगठन और सत्ता दोनों में इन्हें दरकिनार कर दिया है। यहां तक कि समाज के मांगों पर भी अब तक किसी को निगम, मंडल या आयोग में नियुक्ति तक नहीं दी गई है।भाजपा के प्रदेश संगठन में जहां प्रदेश के अन्य संभागों से समाज के प्रतिनिधियों को स्थान मिला है, वहीं बिलासपुर संभाग पूरी तरह से खाली है। न प्रदेश कार्यकारिणी में कोई प्रतिनिधि, न किसी मोर्चा या प्रकोष्ठ में सक्रिय जिम्मेदारी। यह वही संभाग है जहां से भाजपा को कई बार निर्णायक जनादेश मिला, और संगठन की जमीनी ताकत के रूप में कुर्मी समाज ने सक्रिय भूमिका निभाई। लेकिन इस बार उस समाज की मेहनत और प्रतिबद्धता को अनदेखा कर दिया गया है।साय सरकार ने चार महीने पूर्व कई निगम-मंडल-आयोगों में अध्यक्षों की नियुक्तियाँ कीं, परंतु उनमें से किसी में भी बिलासपुर संभाग के कुर्मी समाज का नाम नहीं आया।इससे समाज के भीतर यह धारणा गहराती जा रही है कि भाजपा अब जातिगत संतुलन की जगह व्यक्तिगत निष्ठा और चापलूसी को प्राथमिकता दे रही है।समाज का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेता, जो खुद कुर्मी समाज से आते हैं, उन्होंने भी अपने समाज के कार्यकर्ताओं के लिए आवाज नहीं उठाई।पार्टी के भीतर यह चर्चा भी जोरों पर है कि जो नेता ऊपर बैठे हैं, वे उन युवाओं को आगे नहीं आने देना चाहते जो उनके मुकाबले जनाधार और स्वीकार्यता रखते हैं।वही कुर्मी समाज के वरिष्ठ सामाजिक नेता ने कहा कि आज भाजपा में चापलूसी करने वालों को आगे बढ़ाया जा रहा है, मेहनत करने वालों को नहीं। समाज के सक्रिय कार्यकर्ताओं को पद तो दूर, बुलावा तक नहीं मिलता। यदि स्थिति यही रही तो 2028 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को कुर्मी समाज की नाराज़गी भारी पड़ सकती है। बिलासपुर, कोरबा, मुंगेली और जांजगीर-चांपा जैसे जिलों में कुर्मी समाज की संख्या और प्रभाव निर्णायक है। इन क्षेत्रों में समाज की एकजुट नाराज़गी भाजपा के पारंपरिक जनाधार को प्रभावित कर सकती है। कुर्मी समाज अब संगठित होकर अपनी उपेक्षा के खिलाफ आवाज उठाने की तैयारी में है। सामाजिक संगठनों के साथ-साथ भाजपा के भीतर भी असंतोष बढ़ता जा रहा है।बिलासपुर सर्व कुर्मी समाज के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने स्पष्ट कहा कि हम भाजपा के विरोध में नहीं हैं, लेकिन यदि हमारी मेहनत और निष्ठा का सम्मान नहीं हुआ तो समाज को अपने अधिकार की लड़ाई खुद लड़नी होगी। साय सरकार को यह समझना होगा कि सामाजिक और राजनीतिक समावेशिता ही सुशासन की रीढ़ है।यदि बिलासपुर संभाग जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में समाज के मेहनती कार्यकर्ताओं को दरकिनार किया गया, तो इसका असर केवल पार्टी संगठन पर नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों के समीकरणों पर भी गहरा होगा।


