पत्रकारिता व साहित्‍य परिवर्तन के आधारस्‍तंभ हैं : पद्मश्री विजय। - Sarvavyapi पत्रकारिता व साहित्‍य परिवर्तन के आधारस्‍तंभ हैं : पद्मश्री विजय। - Sarvavyapi

पत्रकारिता व साहित्‍य परिवर्तन के आधारस्‍तंभ हैं : पद्मश्री विजय।

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तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा महाराष्ट्र में 06 से 18 अक्‍टूबर तक आयोजित यूजीसी मालवीय मिशन शिक्षक केंद्र द्वारा शिक्षकों के प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ महादेवी वर्मा सभागार में सोमवार को हुआ। कार्यक्रम के समन्वयक डॉ. संदीप कुमार वर्मा तथा निदेशक प्रो. अवधेश कुमार हैं। प्रशिक्षण कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से 15 राज्यों के प्रतिभागी शामिल हुए हैं, जो मीडिया, साहित्य और समाज के पारस्परिक संबंधों पर विचार-विमर्श करेंगे।उद्घाटन कार्यक्रम के मुख्य वक्ता पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर ने कहा कि साहित्य जैसे व्यापक विषय में पत्रकारिता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। दोनों ही समाज के विचार और परिवर्तन के आधार स्तंभ हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का उल्लेख करते हुए माधवराव सप्रे और मुंशी प्रेमचंद जैसे संपादकों के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बढ़ते उपयोग से अध्ययनशीलता में कमी देखी जा रही है, परंतु कोई भी तकनीक मनुष्य के मस्तिष्क की सृजनात्मकता का स्थान नहीं ले सकती। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौर की पत्रकारिता से लेकर वर्तमान युग के जन-जागरूकता आंदोलनों तक मीडिया की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि मीडिया समाज का दर्पण है, जो विचार और संवेदना दोनों को दिशा देता है।कार्यक्रम के प्रमुख वक्ता प्रो. वीरेंद्र कुमार व्यास ने कहा कि मीडिया को राष्ट्रनिर्माण के लिए एकता की भावना को सशक्त करना चाहिए और विभाजनकारी प्रवृत्तियों से बचना चाहिए। मीडिया केवल सूचना देने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और भावनात्मक एकीकरण का उपकरण भी है। उन्होंने कहा कि मीडिया को ऐसी खबरों को प्राथमिकता देनी चाहिए जो समाज में संवेदनशीलता और आपसी समझ को बढ़ाएं। उन्होंने कहा, मिले सुर मेरा तुम्हारा की भावना के साथ ही सशक्त और समरस भारत का निर्माण संभव है।इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज के अंग्रेजी विभाग के प्रो. मनोज कुमार ने कहा कि मीडिया और साहित्य के बीच संवाद का विस्तार भारतीय अकादमिक परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता है। ज्ञान और भाषा दोनों मिलकर समाज के विचारों को दिशा देते हैं। वहीं, प्रो. श्याम सुंदर दुबे ने कहा कि भारतीय मीडिया को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़कर नए युग की चुनौतियों का सामना करना चाहिए।इस अवसर पर प्रतिभागियों ने भी मीडिया की भारतीय संकल्पनाओं में साहित्य और समाज विषय पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम के अंतर्गत विभिन्न सत्रों में विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षण और विमर्श आयोजित किया जाएगा। यह आयोजन विश्वविद्यालय में शिक्षण और शोध की दिशा में एक सार्थक और प्रेरणादायी पहल के रूप में देखा जा रहा है।


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