के.एस. ठाकुर/ कार्यकारी संपादक /सर्वव्यापी/
रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा), जिसका उद्देश्य ग्रामीणों को रोजगार देकर उनकी आर्थिक स्थिति सुधारना है, अब रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ जनपद में भ्रष्टाचार का प्रतीक बनती जा रही है। योजनाओं के नाम पर सरकारी धन की लूट मची हुई है, जबकि असली मजदूर रोज़गार के लिए दर-दर भटक रहे हैं।सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, धरमजयगढ़ क्षेत्र की कई ग्राम पंचायतों में फर्जी जॉब कार्ड तैयार कर भुगतान उठाने के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। मनरेगा की सूची में ऐसे-ऐसे नाम दर्ज हैं जो गांव में रहते ही नहीं , फिर भी उनके नाम से काम पूरा दिखाकर लाखों रुपये का भुगतान कर लिया जा रहा है।वास्तविक मजदूरों ने आरोप लगाया है कि “काम की मांग करने पर हमें यह कहकर लौटा दिया जाता है कि योजना पूरी हो गई है, जबकि कागजों में हमारा ही नाम दर्ज कर लिया जाता है।” इससे न केवल शासन को आर्थिक क्षति हो रही है बल्कि ग्रामीणों के पेट पर भी लात मारी जा रही है।जानकारों का कहना है कि यदि प्रशासन जॉब कार्डधारकों और भुगतानों का भौतिक सत्यापन कराए तो धरमजयगढ़ से लेकर रायगढ़ तक मनरेगा घोटाले का बड़ा जाल सामने आ सकता है।रायगढ़ जिला प्रदेश के वित्त मंत्री ओमप्रकाश चौधरी का गृह जिला होने के बावजूद विभागीय अमला मनरेगा में मची लूट पर आंख मूंदे बैठा है। सवाल यह उठता है कि क्या धरमजयगढ़ के गरीब मजदूरों का हक़ बचाने के लिए अब भी शासन की नींद खुलेगी, या भ्रष्टाचारियों के संरक्षण में मनरेगा का जनहित मकसद हमेशा के लिए दफन हो जाएगा?ग्रामीणों की मांग है कि फर्जी जॉब कार्ड और भुगतान का भौतिक सत्यापन किया जाए। दोषी पंचायत सचिवों और रोजगार सहायकों पर आपराधिक कार्रवाई हो। असली मजदूरों को बकाया मजदूरी का भुगतान किया जाए।मनरेगा की आड़ में फर्जीवाड़े की यह कहानी अब धरमजयगढ़ के गरीबों की मजबूरी नहीं, बल्कि प्रशासन की संवेदनहीनता और मिलीभगत की मिसाल बनती जा रही है।


