तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में इन दिनों एक अलग ही सत्ता समीकरण देखने को मिल रहा है। विभाग के नए मंत्री गजेन्द्र यादव के कार्यभार संभालते ही मंत्रालय के भीतर ‘मंत्रीशाही बनाम मुख्यमंत्रेशाही’ का टकराव तेज हो गया है। स्थिति यह है कि मुख्यमंत्री सचिवालय के आदेश भी अब विभागीय टेबलों पर ‘रद्दी कागज’ की तरह पड़े रह जाते हैं ,क्योंकि विभागीय अफसरों का कहना है, “यहां मंत्री गजेन्द्र यादव की लिखावट चलेगी, मुख्यमंत्री का आदेश नहीं!”विभागीय सूत्रों ने बताया कि पिछले कुछ हफ्तों में स्कूल शिक्षा विभाग में सैकड़ों स्थानांतरण आदेश जारी किए गए हैं। इनमें से कई मामलों में मुख्यमंत्री सचिवालय ने लिखित आपत्ति जताते हुए आदेशों को तत्काल निरस्त करने का निर्देश दिया था। लेकिन विभागीय सचिव, अवर सचिव और उप सचिव तक ने इन निर्देशों को नजरअंदाज कर दिया।विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, एक वरिष्ठ अधिकारी ने यहां तक कह दिया अगर किसी आदेश पर रोक लगवानी है तो मुख्यमंत्री से नहीं, मंत्री गजेन्द्र यादव से लिखवाकर लाओ। विभाग में वही अंतिम प्राधिकृत हैं।यह बयान अब मंत्रालय के गलियारों में आग की तरह फैल गया है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की छवि पर सीधा असर डालने वाले इस रवैये को लेकर कई वरिष्ठ अफसर असहज हैं।विभागीय सूत्रों ने बताया कि स्कूल शिक्षा विभाग हमेशा से ही सबसे बड़ा मंत्रालय माना जाता है ,हजारों शिक्षक, डीईओ, बीईओ और ब्लॉक स्तरीय कर्मचारी इसी विभाग से जुड़े हैं। लेकिन इन दिनों विभाग में फाइलों पर मंत्री की सिफारिश के बिना कुछ भी आगे नहीं बढ़ रहा है।विभागीय सूत्रों की मानें तो कई स्थानांतरण आदेशों में पारदर्शिता की जगह “व्यक्तिगत प्रभाव और नजदीकी” ने जगह बना ली है। अफसर भी अब उसी लाइन पर चल रहे हैं — “जो मंत्री से जुड़े हैं, वही टिके हैं।”एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि शिक्षा विभाग आज मंत्री की निजी जागीर बन गया है। अफसर मुख्यमंत्री सचिवालय के फोन तक उठाने में परहेज कर रहे हैं। उन्हें डर है कि मंत्री के खिलाफ जाने पर उनकी कुर्सी हिल जाएगी।वहीं,सबसे बड़ा सवाल यही है कि मुख्यमंत्री सचिवालय इस खुली अवहेलना पर चुप क्यों है? सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय तक इस मामले की पूरी रिपोर्ट पहुंच चुकी है, लेकिन अब तक किसी अधिकारी या मंत्री को लेकर सार्वजनिक कार्रवाई नहीं हुई है।राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह चुप्पी आगे चलकर सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।यदि विभागीय मंत्री मुख्यमंत्री के आदेश को नकार रहे हैं, तो यह न केवल अनुशासनहीनता है बल्कि सरकार के अंदर शक्ति-संतुलन का गंभीर संकट है।भाजपा के भीतर भी यह मामला अब चर्चा का विषय बन गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता मानते हैं कि मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री के बीच ‘सामंजस्य की कमी’ पार्टी की छवि पर असर डाल सकती है।गजेन्द्र यादव को शिक्षा मंत्री बनाए जाने के पीछे संगठन का संतुलन साधने की रणनीति थी, लेकिन अब उन्हीं के कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं। पार्टी सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री की सख्त छवि और मंत्री की मनमानी प्रवृत्ति आने वाले महीनों में टकराव का कारण बन सकती है। शिक्षा विभाग के भीतर ही नहीं, शिक्षक संगठन भी अब खुलकर विरोध में आने लगे हैं। स्थानांतरण नीति में पारदर्शिता न होने से शिक्षक संघों में नाराजगी बढ़ रही है। कई शिक्षक प्रतिनिधियों ने कहा कि विभाग में अफसरशाही और मंत्रीशाही का गठजोड़ बन गया है। कोई भी आदेश मेरिट पर नहीं, बल्कि ‘कौन किससे मिला’ पर निर्भर करता है।”अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मुख्यमंत्री सचिवालय की शक्ति घट रही है? क्या विभागीय मंत्री अपनी व्यक्तिगत सत्ता स्थापित करने में सफल हो रहे हैं। फिलहाल तो शिक्षा विभाग में “मंत्रीशाही बनाम मुख्यमंत्रेशाही” की लड़ाई पूरे शबाब पर है। अगर मुख्यमंत्री ने अब भी हस्तक्षेप नहीं किया, तो आने वाले दिनों में यह विवाद सरकार की साख और प्रशासनिक अनुशासन दोनों पर भारी पड़ सकता है।


