तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ में सत्ता संभाले लगभग दस माह होने को हैं, मगर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और भाजपा संगठन अब भी निगम-मंडल, आयोग और बोर्डों में शेष नियुक्तियों को लेकर ‘साइलेंट मोड’ में नज़र आ रहे हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर संगठन महामंत्री पवन साय तक नियुक्तियों के दावेदारों का रोज़ाना तांता लगा हुआ है, लेकिन नतीजा शून्य।प्रदेश की राजनीति में इन लंबित नियुक्तियों ने एक नई हलचल पैदा कर दी है।धान खरीदी की तैयारियाँ जोरों पर हैं, लेकिन जिन जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों से किसानों को भुगतान मिलना है, वहां अब तक अध्यक्ष और संचालक मंडल का गठन ही नहीं हो सका। इससे न केवल प्रशासनिक बल्कि राजनीतिक असमंजस की स्थिति बन गई है।सबसे दिलचस्प बात यह है कि छत्तीसगढ़ की आत्मा ‘राजभाषा छत्तीसगढ़ी’ को बढ़ावा देने के लिए बने छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग में भी अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति अटकी पड़ी है। जबकि विभागीय सूत्रों के अनुसार, आयोग की फाइल सचिवालय में कई दौर घूमने के बाद भी ‘सीएम की स्वीकृति’ की प्रतीक्षा में है।भाजपा संगठन के भीतर भी इस देरी को लेकर असंतोष की फुसफुसाहट तेज़ है। संगठन के कई पदाधिकारी मानते हैं कि नियुक्तियों में देरी सरकार और पार्टी दोनों की साख पर बट्टा लगा रही है।प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तेज़ी से घूम रहा है ,क्या मुख्यमंत्री और संगठन में तालमेल की कमी है, या फिर यह ‘संतुलन साधने’ की रणनीति?”भाजपा के पुराने कार्यकर्ता अब खुलकर कहने लगे हैं कि “अधिकारी सरकार चला रहे हैं, और राजनीतिक नियुक्तियाँ ठंडे बस्ते में हैं।”राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर स्थिति यही रही तो आने वाले निकाय चुनावों में संगठन के भीतर असंतोष पार्टी के लिए सिरदर्द बन सकता है।फिलहाल भाजपा कार्यकर्ता और दावेदार मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के ‘एक हस्ताक्षर’ का इंतज़ार कर रहे हैं ,जो तय करेगा कि कौन ‘सत्ता में भागीदार’ बनेगा और कौन ‘सिर्फ दर्शक’ रह जाएगा।


