विकास नंद /सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ राज्य के गठन को 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं, परंतु आज भी राज्य के कई क्षेत्रों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। ऐसी ही एक मार्मिक तस्वीर सरायपाली विकासखंड से सामने आई है, जहां 15 वर्ष पूर्व घोषित 100 बिस्तरों वाला अस्पताल आज भी मात्र 30 बिस्तरों तक सीमित है।
तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा सरायपाली को एक उच्चस्तरीय 100 बेड की सौगात तो दी थी, जिससे क्षेत्रवासियों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की उम्मीद जगी थी। लेकिन यह सपना आज तक साकार नहीं हो पाया।
अफसोस की बात यह है कि वर्षों बाद भी इस योजना पर समुचित कार्यवाही नहीं हो सकी, जिसका मुख्य कारण स्थानीय जनप्रतिनिधियों की उदासीनता और इच्छाशक्ति की कमी माना जा रहा है।
स्व. मोहनलाल चौधरी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, सरायपाली की वर्तमान स्थिति निराशाजनक है। यहां न तो विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध हैं और न ही पर्याप्त पैरामेडिकल स्टाफ। स्वास्थ्य केंद्र की सेवाएं केवल सामान्य देखभाल तक सीमित रह गई हैं। अस्पताल में संसाधनों की कमी इस हद तक है कि गंभीर मरीजों को मजबूरी में महासमुंद, रायपुर या अन्य शहरों का रुख करना पड़ता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह अस्पताल नेताओं के लिए सिर्फ प्रचार का साधन बनकर रह गया है। अस्पताल परिसर में नेताओं द्वारा अपने जन्मदिन पर फल वितरण और मीडिया में फोटो खिंचवाने की रस्म अदायगी तो होती है, परंतु धरातल पर सुधार के कोई ठोस प्रयास नहीं दिखाई देते।
वहीं, हाल ही में एक ओर विसंगति उस समय सामने आई जब सरायपाली की ही निवासी एवं महासमुंद लोकसभा क्षेत्र की सांसद रूपकुमारी चौधरी बसना विकासखंड के लिए 100 बिस्तर वाले अस्पताल हेतु करीब 18 करोड़ रुपये की स्वीकृति सरकार से दिलाने में सफल रहीं। यह सराहनीय पहल अपने आप में एक सकारात्मक कदम है, परंतु इससे यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि आखिर सरायपाली जैसे प्रमुख कस्बे को अब तक प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई?
छत्तीसगढ़ के रजत जयंती वर्षगांठ के अवसर पर भी सरायपाली को स्वास्थ्य क्षेत्र में कोई ठोस सौगात नहीं मिलना यह दर्शाता है कि यह क्षेत्र आज भी राजनीतिक उपेक्षा का शिकार है परंतु आज भी गरीब परिवार 100बिस्तर के नाम से संचालित स्वास्थ्य केंद्र में ईलाज हेतु जाना पसंद करते हैं इसलिए महासमुंद जिले में जिला अस्पताल को छोड़ दिया जाए तो प्रतिदिन लगभग 300 मरीज रोज आते हैं फिर भी कम स्टॉफ के बावजूद भी बेहतरीन ईलाज किया जाता है।स्थानीय जनता अब जनप्रतिनिधियों से यह सवाल पूछ रही है कि कब तक उन्हें अधूरी स्वास्थ्य सुविधाओं पर निर्भर रहना होगा?
कब तक घोषणाएं कागजों तक सीमित रहेंगी और कब सरायपाली को उसका हक मिलेगा?
छत्तीसगढ़ जैसे प्रगतिशील राज्य में 25 वर्षों के बाद भी अगर एक घोषित 100 बिस्तर का अस्पताल पूरी तरह संचालित नहीं हो पाया है, तो यह नीति निर्माताओं और स्थानीय प्रशासन दोनों के लिए आत्ममंथन का विषय है।
अब समय आ गया है कि सरायपाली के जनप्रतिनिधि इस मुद्दे को प्राथमिकता देते हुए इसे धरातल पर उतारें, ताकि जनता को वास्तव में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकें।


