जब पंच-सरपंच-एमएलए बन सकते हैं बिना डिग्री, तो पीए में ही क्यों अड़चन...? - Sarvavyapi जब पंच-सरपंच-एमएलए बन सकते हैं बिना डिग्री, तो पीए में ही क्यों अड़चन...? - Sarvavyapi

जब पंच-सरपंच-एमएलए बन सकते हैं बिना डिग्री, तो पीए में ही क्यों अड़चन…?

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तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ सरकार के पर्यटन, संस्कृति, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व मंत्री राजेश अग्रवाल के निजी स्टाफ में की जाने वाली नियुक्ति को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। मंत्री ने अपने करीबी तबरेज़ आलम को निज सहायक (पर्सनल असिस्टेंट) के रूप में संविदा आधार पर रखने के लिए प्रस्ताव भेजा था, लेकिन इस पर सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) ने गंभीर आपत्ति जताई है। विभाग ने मंत्रालय नवा रायपुर को भेजे गए पत्र में साफ कहा है कि तबरेज़ आलम की शैक्षणिक योग्यता इस पद के लिए निर्धारित मानक के अनुरूप नहीं है, इसलिए उनकी नियुक्ति नियमसंगत नहीं है और इस पद पर उनकी पदस्थापना संभव नहीं है।मिली जानकारी के अनुसार मंत्री राजेश अग्रवाल ने 15 सितंबर 2025 को भेजी गई टीप में तबरेज़ आलम को निज सहायक पद पर पदस्थ करने का निर्देश दिया था, लेकिन सामान्य प्रशासन विभाग ने मंत्री के इस प्रस्ताव को नियमों के अनुरूप नहीं माना। छत्तीसगढ़ सचिवालय सेवा भर्ती नियम 2012 के अनुसार, तृतीय श्रेणी के पद—कनिष्ठ सचिवालय सहायक/स्टेनो टायपिस्ट—पर सीधी भर्ती के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता 12वीं पास होना अनिवार्य है, जबकि तबरेज़ आलम की योग्यता केवल 8वीं पास (पूर्व माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण) पाई गई है। इसी आधार पर GAD ने इस नियुक्ति को रोक दिया है और मंत्री को सूचित किया गया है कि निर्धारित योग्यता पूरी न होने की स्थिति में यह नियुक्ति संभव नहीं है।इस पूरे मामले को लेकर अब मंत्रालय में चर्चाएं तेज हो गई हैं। सामान्य प्रशासन विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि चाहे नियुक्ति संविदा पर ही क्यों न हो, परंतु सचिवालय सेवा से जुड़े पदों में दस्तावेज़ीय कार्य, पत्राचार, नोटिंग-ड्राफ्टिंग और सरकारी फाइलों का प्रबंधन जैसे संवेदनशील कार्य शामिल होते हैं, इसलिए शैक्षणिक योग्यता में किसी भी तरह की छूट नहीं दी जा सकती। विभाग का तर्क है कि नियमों के विपरीत कोई भी नियुक्ति शासन स्तर पर मान्य नहीं होगी, इसलिए मंत्री की अनुशंसा पर फिलहाल प्रशासनिक रोक जारी रहेगी।हालांकि इस निर्णय के बाद एक बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि जब पंचायत से लेकर विधानसभा और संसद तक किसी भी प्रतिनिधि पद के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की कोई बाध्यता नहीं है, तब एक मंत्री अपने भरोसेमंद व्यक्ति को संविदा पर निज सहायक या निज सचिव के रूप में क्यों नहीं रख सकता? लोकतांत्रिक व्यवस्था में आज भी पांचवीं या आठवीं पास व्यक्ति सरपंच, पंच, पार्षद, विधायक, सांसद और यहां तक कि मंत्री बन सकता है, तो फिर एक मंत्री अपने करीबी व्यक्ति को केवल पांच साल के लिए संविदा नियुक्ति पर क्यों नहीं रख सकता?इस पूरे प्रकरण ने शासन की “योग्यता नीति” पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। क्या योग्यता केवल कर्मचारियों और सहायकों के लिए आवश्यक है, या फिर जनप्रतिनिधियों पर भी समान रूप से लागू होनी चाहिए? यह दोहरा मापदंड शासन व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है।


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