नूर मोहम्मद/ गौरेला-पेंड्रा-मरवाही/(सर्वव्यापी)
लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की नींव रखने वाला सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) अब जीपीएम जिले में अपनी साख खोता जा रहा है। जिले के अधिकांश शासकीय कार्यालय इस कानून को ठेंगा दिखाते हुए आरटीआई आवेदनों पर जवाब देना मुनासिब नहीं समझते। इससे आम जनता का शासन पर विश्वास कमजोर हो रहा है।कानून के अनुसार प्रत्येक विभाग को किसी भी नागरिक द्वारा मांगी गई जानकारी 30 दिनों के भीतर देना अनिवार्य है। परंतु वास्तविकता यह है कि कई कार्यालय महीनों तक जवाब नहीं देते, या फिर आवेदन को इधर-उधर घुमाकर समय टालते हैं इस रवैये से आवेदक निराश और भ्रमित रहते हैं।स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि “आरटीआई कानून आम आदमी के अधिकारों की रीढ़ है। लेकिन जब अधिकारी ही जवाबदेही से बचने लगें,तो पारदर्शिता की भावना खत्म हो जाती है।” उन्होंने यह भी कहा कि यदि जल्द ही जिला प्रशासन इस ओर गंभीरता नहीं दिखाता, तो आरटीआई कानून केवल कागज़ी औपचारिकता बनकर रह जाएगा। कई आवेदक अब राज्य सूचना आयोग तक अपील करने को मजबूर हैं, जहाँ भी लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है।जनजागरण की आवश्यकता महसूस करते हुए नागरिकों ने मांग की है कि जिला प्रशासन सभी विभागों को आरटीआई अधिनियम के पालन के लिए सख्त निर्देश जारी करे और जवाब न देने वाले अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।


