तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की अध्यक्षता में हो रही कैबिनेट बैठक पर आज पूरे प्रदेश की निगाहें टिकी हैं। कारण सिर्फ इतना नहीं कि सहकारी केन्द्रीय बैंकों के माध्यम से कल से धान खरीदी का महाअभियान शुरू होने जा रहा है, बल्कि इसलिए भी कि इन बैंकों के अध्यक्षों और संचालक मंडलों की नियुक्ति को लेकर सरकार अब निर्णायक कदम उठाने वाली बताई जा रही है।छत्तीसगढ़ में सहकारी तंत्र न केवल धान खरीदी की रीढ़ माना जाता है, बल्कि राजनीतिक प्रभाव और जमीनी पकड़ का सबसे बड़ा आधार भी है। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि शासन परिवर्तन के बाद सत्ता नए समीकरणों के अनुरूप सहकारी संस्थाओं में फेरबदल करे। बीजेपी नेतृत्व वाले विष्णु देव साय सरकार की अब तक की कार्यशैली को देखें तो प्रशासनिक कसावट, जिम्मेदारी तय करने और जवाबदेही की भावना स्पष्ट नजर आती है। इसी क्रम में जिला सहकारी केन्द्रीय बैंकों में प्रमुख पदों पर बदलाव की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।कैबिनेट बैठक से पहले संगठन और सत्ता, दोनों स्तरों पर व्यापक मंथन हुआ है। सूत्रों का दावा है कि धान खरीदी की सुचारु व्यवस्था सुनिश्चित करने और सहकारी ढांचे को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए सरकार ऐसे चेहरों को मौका देना चाहती है, जिनकी प्रशासनिक पकड़ मजबूत हो, जमीनी अनुभव पर्याप्त हो और संगठन की नीतियों के प्रति निष्ठा भी।इसके साथ ही विपक्ष पहले ही आरोप लगा रहा है कि सरकार धान खरीदी के बहाने सहकारी संस्थाओं पर कब्ज़ा जमाना चाहती है। लेकिन सरकार का तर्क है कि धान खरीदी जैसे संवेदनशील और व्यापक अभियान के लिए सक्षम, सक्रिय और जवाबदेह नेतृत्व जरूरी है।कैबिनेट बैठक यह स्पष्ट कर सकती है कि जिला सहकारी केन्द्रीय मर्यादित बैंकों के संचालन में सरकार कितना बड़ा बदलाव करने जा रही है।इस बीच किसान धान खरीदी को लेकर उत्साहित हैं, पर सहकारी तंत्र में होने वाली संभावित नियुक्तियों पर भी उतनी ही नजरें टिकी हुई हैं। क्योंकि यह सिर्फ पदों का बदलाव नहीं, बल्कि प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था और ग्रामीण राजनैतिक संरचना को सीधे प्रभावित करने वाला निर्णय होगा।अब नजरें इस पर हैं कि क्या मुख्यमंत्री विष्णु देव साय आज कैबिनेट में सहकारी बैंकों के अध्यक्षों और संचालक मंडलों की नियुक्ति को हरी झंडी देते हैं या फैसला धान खरीदी शुरू होने के बाद तक टलता है।


