विकास नंद/ सर्वव्यापी/
जहां एक ओर भारत ने विज्ञान और तकनीक की नई ऊंचाइयों को छूते हुए चांद तक अपना परचम लहरा दिया है, वहीं दूसरी ओर समाज की कटु सच्चाई अब भी हमारे सामने सवाल बनकर खड़ी है। सरायपाली नगर में आज सड़क किनारे एक मासूम बच्चे को करतब दिखाते देखा गया। नंगे पांव, थका हुआ चेहरा और उम्मीद की किरण लिए वह बच्चा दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करता नजर आया।इस मार्मिक दृश्य ने राहगीरों के साथ-साथ समाज के हर जागरूक नागरिक के मन को झकझोर दिया। देश तरक्की की नई उड़ान भर रहा है, पर ज़मीनी हकीकत बताते ऐसे दृश्य यह याद दिलाते हैं कि अभी भी समाज का एक बड़ा वर्ग सरकारी जनकल्याणकारी योजनाओं से वंचित है। बाल श्रम, गरीबी और शिक्षा से दूर होते बच्चे हमारे पूरे प्रशासनिक तंत्र और सामाजिक संवेदना पर प्रश्न खड़ा करते हैं।स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार द्वारा बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य व पुनर्वास के लिए अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन इन योजनाओं का वास्तविक लाभ अब भी ज़रूरतमंदों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाता। सवाल यह भी है कि प्रशासन की निगरानी व्यवस्था ऐसे बच्चों तक क्यों नहीं पहुंच पाती, जो मजबूरीवश खुले आसमान के नीचे प्रदर्शन कर पेट भरने को मजबूर हैं।सामाजिक कार्यकर्ताओं को इस तरह की घटनाओं को गंभीरता से लेना चाहिए ताकि ऐसे बच्चों की पहचान कर उन्हें शिक्षा से जोड़ना, पुनर्वास देना तथा उनके परिवारों को आजीविका उपलब्ध कराना सरकार और समाज दोनों की साझा जिम्मेदारी है। यदि संबंधित विभाग सक्रियता दिखाए तो ऐसे मासूमों का भविष्य संवारा जा सकता है।इस भावुक दृश्य ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि जब तक “जमीं पर तारों” की जिंदगी नहीं बदलेगी, तब तक चांद पर पहुंचना भी अधूरा सा लगता है। समाज और प्रशासन दोनों को मिलकर इन बच्चों के लिए सुरक्षित, शिक्षित और सम्मानजनक भविष्य सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।


