तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ में राज्योत्सव 2025 की चकाचौंध के बीच जनसंपर्क विभाग में विज्ञापन मद के नाम पर करोड़ों रुपये के दुरुपयोग की चर्चा प्रशासनिक और मीडिया गलियारों में तेजी से फैल रही है। विभागीय सूत्रों के अनुसार अखबारों, न्यूज चैनलों, मासिक पत्रिकाओं, और बैनर–पोस्टर की आड़ में भारी-भरकम बिलों को स्वीकृति दिलाकर पूरे प्रकरण को ‘राज्योत्सव के खर्च’ की ओट में छिपाया जा रहा है।विभागीय सूत्र बताते हैं कि विज्ञापन आवंटन की फाइलें बिना पारदर्शी प्रक्रिया के सीधे कुछ पसंदीदा संस्थानों को भेजी गईं, जहां वास्तविक मार्केट रेट से कई गुना अधिक दरें दर्शाकर भुगतान की सिफारिश की गई। कई ऐसे मीडिया संस्थानों को भी राशि बांटने की तैयारी बताई जा रही है, जिनका न तो व्यापक प्रसार-प्रचार है और न ही राज्योत्सव से संबंधित कोई उल्लेखनीय गतिविधि।मासिक पत्रिकाओं व स्थानीय स्तर पर संचालित डिजिटल प्लेटफार्मों को भी लाखों-करोड़ों के विज्ञापन जारी होने की बातें सामने आ रही हैं। बैनर–पोस्टर के लिए राज्यभर में जितनी सामग्री लगी ही नहीं, उससे कई गुना अधिक का बिल विभाग में लगाया जाना, जनसंपर्क महकमे की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है।विभागीय अधिकारियों का एक खंड यह मान रहा है कि विज्ञापन के नाम पर यह ‘सिंडिकेट’ लंबे समय से सक्रिय है, और राज्योत्सव जैसे आयोजनों को इनके लिए ‘खुला अवसर’ माना जाता है।ऐसे में अब सबकी निगाहें जनसंपर्क विभाग के सचिव डॉ. रोहित यादव पर टिक गई हैं, जिनसे उम्मीद है कि वे न केवल पूरे प्रकरण की आंतरिक जांच कराएं, बल्कि विज्ञापन जारी करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और जवाबदेही सुनिश्चित करें। विभाग के भीतर से निकल रही आवाजें कहती हैं कि “अगर अभी सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो यह घोटाला आने वाले समय में सरकार की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।”राज्योत्सव के नाम पर खर्च हुए करोड़ों की वास्तविकता क्या है – क्या सचमुच आयोजन की जरूरतों के अनुरूप भुगतान हुआ, या फिर ‘विज्ञापन रैकेट’ ने इसे अवसर बनाकर सरकारी खजाने को चूना लगाया?इसका स्पष्ट जवाब केवल उच्चस्तरीय जांच से ही सामने आएगा।


