तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ का बस्तर—एक नाम जो दशकों तक नक्सल हिंसा, भय और सरकारी विफलताओं का प्रतीक माना जाता रहा, अब अपनी पहचान बदलने की दहलीज पर खड़ा है। कभी लाल गलियारों में घिरा यह इलाका अब निवेश, खनन और बुनियादी विकास की नई संभावनाओं को उगलने लगा है। प्रशासनिक और सुरक्षा एजेंसियों का दावा है कि बस्तर अब नक्सलियों का गढ़ नहीं, बल्कि ‘सोना उगलने वाला’ क्षेत्र बन सकता है। परंतु इस दावे के पीछे कई सवाल खड़े होते हैं, क्या वाकई बस्तर नक्सल मुक्त होकर विकास की राह पर है या यह एक राजनीतिक बयानबाज़ी भर है?पिछले दो वर्षों में सुरक्षा बलों ने बस्तर के कई कोर इलाक़ों में दबाव बनाया है। बड़ी संख्या में नक्सलियों के मारे जाने, सरेंडर करने और कैडर के कमजोर होने के आंकड़े सरकार ज़ोरशोर से पेश कर रही है। कुछ इलाकों में पहली बार सड़कें पहुँची हैं, मोबाइल नेटवर्क सक्रिय हुआ है और पुलिस कैंपों के विस्तार से ‘इलाका कब्ज़े की राजनीति’ तेज हुई है।लेकिन कई गांवों में आज भी रात होने पर भय का माहौल है। नक्सली पूरी तरह खत्म भले न हुए हों, पर उनका प्रभाव कमजोर जरूर हुआ है। आलोचकों का कहना है कि सरकार केवल अभियान और इनकाउंटर का आंकड़ा दिखाती है, पर जर्जर स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे पर उतना ही ध्यान नहीं दिया जाता।बस्तर की धरती के नीचे लोहे, बॉक्साइट, हीरा, कोरंडम और दुर्लभ खनिजों का भंडार है। सरकार अब तेजी से इस दिशा में काम बढ़ा रही है। बड़े कॉरपोरेट घरानों की दिलचस्पी बढ़ रही है, जिसे राज्य सरकार ‘विकास का नया मॉडल’ बता रही है।पर वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या खनिज आधारित विकास बस्तर के लोगों के जीवन में बदलाव लाएगा या यह पिछले 25 सालों जैसी विस्थापन-केंद्रित कथाओं को दोहराएगा? आदिवासी समुदायों में अभी भी आशंका है कि खनन परियोजनाओं के नाम पर उनके जल-जंगल-जमीन का दोहन बढ़ेगा।बस्तर दो चौराहे पर खड़ी है-एक तरफ सड़क, बिजली, इंटरनेट, स्कूल, पर्यटन और रोजगार की उम्मीदें तो दूसरी तरफ जमीन छिनने का डर, सांस्कृतिक हाशिए पर जाने की पीड़ा और सुरक्षा अभियानों में आम लोगों के फंसने की घटनाएं। यही वजह है कि सरकार के “बस्तर सोना उगल रहा है” वाले दावे पर लोग दो राय रखते हैं। विकास दिख रहा है, पर उसकी दिशा, गति और न्यायसंगतता पर सवाल भी उतने ही बड़े हैं।वहीं राजनीतिज्ञों का कहना है कि बस्तर को नक्सल-मुक्त घोषित करने की जल्दबाज़ी राजनीतिक रूप से उपयोगी है। निवेशकों के लिए माहौल तैयार करना, केंद्र के साथ विकास-आधारित छवि पेश करना और चुनावी मौसम में उपलब्धियां गिनाना, ये तीनों पहलू साफ नजर आते हैं। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि बस्तर को स्थायी रूप से बदलना है तो सिर्फ सुरक्षा और खनन से काम नहीं चलेगा। शासन की पारदर्शिता, ग्राम सभाओं की सहमति, स्थानीय युवाओं की भागीदारी और सांस्कृतिक-सामाजिक संवेदनशीलता ही बस्तर को नया चेहरा दे सकती है।इससे यह कहना गलत नहीं होगा कि बस्तर अब पहले जैसा नहीं है,यह सच है। नक्सली प्रभाव घटा है,यह भी सच है। पर बस्तर पूरी तरह नक्सल-मुक्त हो गया, यह दावा अभी वास्तविकता से दूर है और “बस्तर सोना उगलेगा” यह तभी सार्थक होगा जब इस सोने का हिस्सा बस्तर के असली मालिकों, उसके आदिवासी समुदायों तक पहुंचे।विकास की गाड़ी चल चुकी है, पर उसके पहियों का संतुलन अभी भी चुनौती में है।


