तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी से है। यह वह भाषा है जो संस्कृति, गीत, लोकजीवन और संपदा की आत्मा है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि राजभाषा का दर्जा मिलने के बावजूद छत्तीसगढ़ी आज भी संस्थागत उपेक्षा की शिकार है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग पिछले कई वर्षों से अध्यक्ष और सदस्यों के बिना ही निष्क्रिय पड़ा है।पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष धरम लाल कौशिक ने जनता की भावनाओं को समझते हुए छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा देकर ऐतिहासिक पहल की थी। लेकिन भाषा के विकास, संरक्षण और प्रसार के लिए जो संस्थागत व्यवस्था बननी थी, वह न कांग्रेस सरकार के दौरान आगे बढ़ सकी और न ही वर्तमान सरकार में कोई ठोस कदम उठाया गया।विष्णु देव साय सरकार के दो साल गुजरने जा रहा हैं, पर राजभाषा आयोग में अध्यक्ष और सदस्य नियुक्त करने का निर्णय अब तक ठंडे बस्ते में है। सरकार का नारा—“हमने बनाया है, हम ही संवारेंगे”—छत्तीसगढ़ी भाषा के मामले में कहीं लागू होता नहीं दिखाई देता। सवाल उठना लाज़िमी है कि जिस भाषा को भाजपा सरकार ने राजभाषा का दर्जा दिया, उसी भाषा के संरक्षण के लिए आयोग को पुनर्जीवित करने में यह सरकार रुचि क्यों नहीं दिखा रही?इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल की चुप्पी लगातार चर्चाओं को जन्म दे रही है। शासन–प्रशासन के भीतर यह भावना मजबूत हो रही है कि यदि मुख्यमंत्री इस नियुक्ति को लेकर पहल नहीं करेंगे, तो भाषा विकास की योजनाएँ आगे बढ़ना मुश्किल है।ऐसे में अब नज़रें टिकी हैं मुख्य सचिव विकास शील और मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह पर। दोनों अधिकारी प्रशासनिक मजबूती और निर्णायक कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं। राजभाषा आयोग को पुनः सक्रिय करने, नई नीतियाँ लागू करने और छत्तीसगढ़ी भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए इन्हें अब निर्णायक भूमिका निभानी होगी।राजभाषा आयोग की निष्क्रियता से भाषा संवर्धन, पाठ्यक्रम निर्माण, अनुवाद कार्य, सरकारी पत्राचार में छत्तीसगढ़ी के उपयोग और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण कार्य ठप पड़े हैं। यदि शीघ्र कदम नहीं उठाए गए, तो भाषा विकास की कई योजनाएँ कागजों में ही सिमट कर रह जाएँगी।राज्य की मातृभाषा का सम्मान केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि ठोस निर्णयों से होता है। अब यह सरकार पर निर्भर है कि वह अपने ही नारे को सार्थक सिद्ध करे और यह तभी संभव है, जब मुख्य सचिव विकास शील और सीएम टू पीएस सुबोध कुमार सिंह त्वरित कार्रवाई कर राजभाषा आयोग को मजबूत आधार दें। अब गेंद अधिकारियों के पाले में है और जनता इंतज़ार कर रही है निर्णायक कदमों का।


