लोक शिक्षण संचालनालय में नई कार्यसंस्कृति की मिसाल,दो उप संचालक आशुतोष - बंजारा की जोड़ी विभाग को दे रही नई दिशा। - Sarvavyapi लोक शिक्षण संचालनालय में नई कार्यसंस्कृति की मिसाल,दो उप संचालक आशुतोष - बंजारा की जोड़ी विभाग को दे रही नई दिशा। - Sarvavyapi

लोक शिक्षण संचालनालय में नई कार्यसंस्कृति की मिसाल,दो उप संचालक आशुतोष – बंजारा की जोड़ी विभाग को दे रही नई दिशा।

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तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/

लोक शिक्षण संचालनालय छत्तीसगढ़ में इन दिनों प्रशासनिक दक्षता, शैक्षिक सुधार और फील्ड लेवल मैनेजमेंट को लेकर जिस तरह की चुस्ती और पारदर्शिता दिखाई दे रही है, उसके पीछे दो वरिष्ठ अधिकारियों—उप संचालक आशुतोष चावरे और उप संचालक एन.के. बंजारा—की मजबूत नेतृत्व क्षमता और निरंतर सक्रियता सबसे बड़ा कारण बनकर उभरी है। विभाग में लंबे समय बाद ऐसा समन्वय देखने को मिल रहा है, जहाँ दोनों अधिकारी अपनी-अपनी भूमिका को न केवल पूरी गंभीरता से निभा रहे हैं, बल्कि एक-दूसरे के कार्यों को पूरक बनाते हुए शिक्षा विभाग के संरचनात्मक कामकाज को मजबूत बना रहे हैं।उप संचालक आशुतोष चावरे अपनी शांत, व्यवहारिक और अनुशासित कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं। विभागीय बैठकों में दस्तावेज़ आधारित समीक्षा, शिक्षकों से सीधे संवाद और फाइल पेंडेंसी को कम करने जैसे कदमों ने संचालनालय की गति को तेज किया है। चावरे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे फील्ड से आने वाली समस्याओं को केवल कागज़ पर नहीं रहने देते, बल्कि उनके समाधान की समयबद्ध मॉनिटरिंग करते हैं, जिससे जिलों के अधिकारियों में भी कार्य के प्रति नई ऊर्जा देखने को मिल रही है।वहीं दूसरी ओर उप संचालक एन.के. बंजारा, जो प्रशासनिक अधिकारी होने के साथ-साथ छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत के जाने-माने गायक और लेखक भी हैं, अपनी बहुआयामी प्रतिभा से न केवल शिक्षा विभाग में नई सकारात्मक पहचान बना रहे हैं, बल्कि स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा देने की दिशा में भी प्रेरणादायक भूमिका निभा रहे हैं। विभागीय कर्मचारियों के अनुसार, बंजारा का व्यक्तित्व अत्यंत सरल, सहज और प्रेरणादायी है, जो उनके प्रशासनिक निर्णयों में भी स्पष्ट दिखाई देता है। वे स्कूलों में सह-शैक्षणिक गतिविधियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और भाषा-आधारित सीखने की प्रक्रियाओं को जोड़ने के पक्षधर हैं, जिससे बच्चों में भी छत्तीसगढ़ी संस्कृति के प्रति लगाव बढ़ाने की दिशा में नया माहौल बन रहा है।दोनों अधिकारियों की कार्यशैली में सबसे बड़ी समानता यह है कि वे विभागीय मुद्दों को “टीम अप्रोच” के साथ हल करने में विश्वास रखते हैं। न तो किसी प्रकार की टकराव की स्थिति सामने आती है और न ही फील्ड से आने वाला कोई काम अनावश्यक देरी का कारण बनता है। एक ओर चावरे जहाँ तकनीकी और प्रशासनिक सुधार पर फोकस करते हैं, वहीं बंजारा मानव संसाधन, संवेदनशीलता और सांस्कृतिक जुड़ाव को प्राथमिकता देते हैं। यही समन्वय वर्तमान समय में विभाग की मजबूती का बड़ा आधार बन गया है।समीक्षात्मक दृष्टि से देखा जाए तो शिक्षा विभाग जैसे बड़े और जटिल ढांचे में इस तरह का संतुलित नेतृत्व दुर्लभ माना जाता है। लेकिन वर्तमान में लोक शिक्षण संचालनालय छत्तीसगढ़ में यह संतुलन न केवल दिखाई दे रहा है, बल्कि वास्तविक परिणामों में भी परिलक्षित हो रहा है। शिक्षकों के स्थानांतरण, पदस्थापना, संसाधनों के वितरण और योजनाओं की प्रगति जैसे विषयों पर पारदर्शी और संवेदनशील रवैया दोनों अधिकारियों की प्रशासनिक सफलता का स्पष्ट प्रमाण है।विभागीय कर्मचारियों में यह विश्वास बढ़ा है कि यदि इसी प्रकार कार्यस्थल पर सकारात्मकता, समन्वय और परिणाम-प्रधान कार्यशैली आगे भी जारी रही, तो छत्तीसगढ़ का शिक्षा तंत्र आने वाले दिनों में और अधिक मजबूत और सुचारु ढंग से संचालित होगा। आशुतोष चावरे और एन.के. बंजारा की यह कार्यशैली निश्चित ही विभाग के लिए एक अनुकरणीय मॉडल बनकर उभर रही है।


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