संपादक के कलम से...18 बरस के राजभाषा… फेर छत्तीसगढ़ी आज घलो परदेसी! नेता–मंत्री, अफसर–बाबू, सब्बो ले एकेच सवाल—मोर माटी के भाषा के अपराध काय हे...? - Sarvavyapi संपादक के कलम से...18 बरस के राजभाषा… फेर छत्तीसगढ़ी आज घलो परदेसी! नेता–मंत्री, अफसर–बाबू, सब्बो ले एकेच सवाल—मोर माटी के भाषा के अपराध काय हे...? - Sarvavyapi

संपादक के कलम से…18 बरस के राजभाषा… फेर छत्तीसगढ़ी आज घलो परदेसी! नेता–मंत्री, अफसर–बाबू, सब्बो ले एकेच सवाल—मोर माटी के भाषा के अपराध काय हे…?

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तरुण कौशिक/संपादक/सर्वव्यापी

28 नवंबर छत्तीसगढ़िया मन बर बड़े गर्व के दिन कहे जाथे, काबर कि 2007 मं विधानसभा छत्तीसगढ़ी ला राजभाषा बनाय रहिस। फेर 18 बछर होगे—आज घलो छत्तीसगढ़ी राजभाषा कागज मं तिहीं चमकथे, सरकार के फाइल मं तिहीं ठनके रहिथे, दफ्तर के दीवाल मं पोस्टर बनके तंगथे, फेर जनता के मन मं एकेच पीरा उठत हे—अगर राजभाषा ह मोर छत्तीसगढ़ी आय, त मोर भाषा के सम्मान काबर नइ दिखत? सरकार बदलत रहिस, मुख्यमंत्री बदलत रहिन, मंत्री बदलत रहिन—फेर छत्तीसगढ़ी के हालत आज घलो ओही हे जेन 18 बछर पहिली रहिस। डॉ. रमन सिंह राजभाषा बनायिन, धरमलाल कौशिक विधेयक पास करवायिन, भूपेश बघेल ‘छत्तीसगढ़िया वाद’ के नारा लगायिन—फेर घलो छत्तीसगढ़ी के राष्ट्रीय पहचान आज तक नइ बन सकिस। ये सिरिफ राजनीतिक असफलता नइ—ये हमन छत्तीसगढ़िया मन के आत्मा के चोट हे।सबले बड़े पीरा ये आय कि जेन छत्तीसगढ़ लोकसेवा आयोग ले अफसर–अधिकारी बनके निकलथें, जेन मन ददा–दाई के घर मं छत्तीसगढ़ी मं बोलत–खेलत बड़े होथें, ओही मन जब दफ्तर पहुंचथें त छत्तीसगढ़ी ला परदेसी जइसन बिहावत सुरू कर देथें। दाई के बोली मं बात करे मं जेन मन घलो हिचकिचात न रहंय, ओमन आज एक नोटशीट छत्तीसगढ़ी मं लिख नइ पावत। जब अधिकारी अउ बाबू छत्तीसगढ़ी लिख–पढ़ नइ पावत, त सरकार लाखों–करोड़ों रूपिया प्रशिक्षण के नाम मं काबर फूंकथें? ये प्रशिक्षण कहां चलत हे, काकर बर चलत हे, नतीजा काय हे—कऊनो अफसर ला पूछव, सब्बो जवाब देही—“प्रक्रिया जारी हे…” प्रक्रिया जारी आय, फेर भाषा अउ समाज—दूनों ल ठगे जाथें।18 बछर मं छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग आधा मरे जइसन पड़े रहिस। न अध्यक्ष, न सदस्य, न नीति, न फाइल, न दिशा। संस्कृति मंत्री बदले, सचिव बदले, सरकार बदले, फेर छत्तीसगढ़ी बर किसी घलो जिम्मेदारी लइया नइ दिखिस। ये सवाल सिरिफ नेतामन लेच नइ—अब ये सवाल आईएएस , आईपीएस, आईएफएस विभागीय सचिव, कलेक्टर, SP, SDM, तहसीलदार—सब्बो अफसर मन ले हे। नेता मन चुनाव देखके बोलथें, फेर अफसर मन? ओमन त पढ़े–लिखे, नीति बनायय्या, दस्तावेज तैयार करे वाले हवंय—का ओमन छत्तीसगढ़ी नइ समझंय? का छत्तीसगढ़ी मं नोटशीट बने त देश–दुनिया डगमगा जाही? एकेच सवाल मन मं उठत हे—का छत्तीसगढ़ी भाषा ला शासन–प्रशासन मं हक नइ?संस्कृति विभाग हर बछर करोड़ों रूपिया छत्तीसगढ़ी भाषा कार्यक्रम–प्रशिक्षण मं खर्च कर देथे, फेर नतीजा?नतीजा ये कि राजभाषा दिवस मं मंच भर जाथे, फूल–माला लग जाथे, अफसर–नेता भाषण पढ़ देथें, फोटो सोशल मीडिया मं चमक जाथे—अगले दिन ले सब्बो चीज फिर से ठेहुंवा ‘अंग्रेजी–हिंदी’ के राज मं वापस।का येच राजभाषा?का येच सम्मान?राजभाषा आयोग घलो आज तक राजनीतिक नियुक्ति के इंतजार मं पड़े हे। का फिर रमन सरकार जइसन जाति–वाद अउ बुढ़वा साहित्यकार मन के कुर्सी बांटे जाही?का फेर कोनो नवयुवा, छत्तीसगढ़ी माटी मं रचे–बसे, भाषा के पीरा समझइय्या ला मौका मिलही?18 बछर—एक पीढ़ी बदल जाथे।बच्चा जवान हो जाथे।मोबाइल अपन गांव ले दुनिया तक पहुंच देथे।इंटरनेट छत्ता मं उगथे।फेर छत्तीसगढ़ी?अभी घलो सरकारी दफ्तर के दुआर मं अपमानित होवत खड़े हे।ये भाजपा कांग्रेस के असफलता त आयच-फेर हकीकत ये घलो आय किअफसर मन के भीतर छत्तीसगढ़ी के प्रति सम्मान शून्य होगे हे।राजभाषा सिरिफ कानून झन आय,राजभाषा वो आय-जेन ला जनता अपन घर मं बोले,अफसर अपन दफ्तर मं लिखे,नेता अपन मंच मं माने,और समाज अपन अस्मिता मं जिये।छत्तीसगढ़ी आज एकेच सवाल पूछत हे-“मोला राजभाषा कहि देथव…फेर मोर नाम के कागज मं जगह काबर नइ देथव?”18 बरस के पीरा कहिथे—अब बस! नेता घलो जिम्मेदार, अफसर घलो जिम्मेदार। राजभाषा दिवस मनाना आसान हे, राजभाषा के सम्मान ला जियाना कठिन। अब समय हे कि सरकार, नेता, अफसर, सचिव—सब्बो मिलके छत्तीसगढ़ी ला ओही आदर देवें, जेन आदर छत्तीसगढ़ के माटी–धुर्रा हकदार हे।राजभाषा मिल गे,अब सम्मान दे बर जिम्मेदारी सब्बो के आय।


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