विकास नंद/ सर्वव्यापी/
सोशल मीडिया पर एक महिला पुलिसकर्मी से जुड़ा वायरल वीडियो इन दिनों पूरे छत्तीसगढ़ में चर्चा और चिंता का विषय बना हुआ है। शांति, सौहार्द और भाईचारे के लिए पहचाने जाने वाले इस राज्य के लोगों को इस वीडियो ने भीतर तक विचलित कर दिया है। जिस छत्तीसगढ़ को वर्षों से “शांत प्रदेश” और “छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” के नारे से जाना जाता रहा है, वहां बढ़ता आक्रोश और हिंसक घटनाएं गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।एक ओर राज्य नक्सलवाद से मुक्ति की दिशा में निर्णायक दौर में पहुंच चुका है। नक्सल मुक्त छत्तीसगढ़ का सपना साकार होने का काउंटडाउन शुरू हो चुका है, सुरक्षा बलों की सफलता और विकास कार्यों से आम जनता में विश्वास भी बढ़ा है। लेकिन दूसरी ओर, हालिया घटनाक्रम में जिस तरह का गुस्सा, उत्तेजना और हिंसक प्रतिक्रिया सामने आ रही है, वह राज्य की सामाजिक संरचना के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकती है।वायरल वीडियो के बाद कई स्थानों पर धरना-प्रदर्शन देखने को मिले, जो सामान्य विरोध से आगे बढ़कर आक्रोशित हिंसा और आगजनी में तब्दील हो गए। छत्तीसगढ़ में यह दृश्य पहली बार देखने को मिल रहा है, जहां आम और शांतिपूर्ण प्रदर्शन कानून व्यवस्था के लिए चुनौती बनते नजर आए। इससे यह स्पष्ट होता है कि समाज में असंतोष और भावनात्मक उबाल किस स्तर तक पहुंच चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति केवल एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक यक्ष प्रश्न बनती जा रही है—क्या छत्तीसगढ़ अपनी शांति और सहिष्णुता की पहचान को बनाए रख पाएगा?
यदि समय रहते इस बढ़ते आक्रोश, गलत सूचनाओं और सोशल मीडिया पर फैल रही अफवाहों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो राज्य की सबसे बड़ी पहचान खतरे में पड़ सकती है।प्रशासन और समाज दोनों के लिए यह आत्ममंथन का समय है।
जरूरत है संवेदनशील संवाद, पारदर्शी जांच और कानून के दायरे में सख्त लेकिन संतुलित कार्रवाई की। साथ ही नागरिकों से भी अपेक्षा है कि वे संयम और विवेक से काम लें, अफवाहों से बचें और शांति बनाए रखने में सहयोग करें।क्योंकि छत्तीसगढ़ की असली ताकत उसकी शांति, संस्कार और भाईचारे में है—और इसी पहचान को बचाए रखना आज की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है।