तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ राज्य बने ढाई दशक बीत चुके हैं, लेकिन जिस छत्तीसगढ़ी भाषा के नाम पर सत्ता, संस्कृति और अस्मिता की राजनीति की जाती रही, वही भाषा आज भी संवैधानिक दर्जे, ठोस नीति और रोजगार से वंचित है। सरकार हर मंच पर छत्तीसगढ़ी को “गुरतुर” बताती है, मगर सवाल यह है कि अगर भाषा इतनी ही प्रिय है तो आज तक उसे संविधान की आठवीं अनुसूची में क्यों नहीं पहुंचाया जा सका?राज्य सरकार छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस मनाती है, साहित्यकारों को सम्मानित करती है, पुस्तकों का विमोचन करती है और फोटो खिंचवाकर कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है। लेकिन यही सरकार यह बताने से बचती है कि छत्तीसगढ़ी में एमए और शोध करने वाले सैकड़ों युवा आज बेरोजगार क्यों हैं? क्या छत्तीसगढ़ी सिर्फ भाषणों और स्मारिकाओं तक सीमित रखने के लिए है?सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि अपने ही राज्य में छत्तीसगढ़ी को आज तक प्रशासन, न्याय और शिक्षा की मुख्य भाषा नहीं बनाया जा सका। प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा की बातें होती हैं, लेकिन न स्पष्ट पाठ्यक्रम है, न शिक्षक पदों की ठोस भर्ती, न दीर्घकालिक नीति। हाईकोर्ट में जब यह सवाल उठता है कि छत्तीसगढ़ी बोली है या भाषा, तब सरकार का मौन उसकी भाषाई प्रतिबद्धता की पोल खोल देता है।संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की मांग वर्षों से उठ रही है, मगर यह मांग हर सरकार में सिर्फ प्रस्ताव, ज्ञापन और आयोजनों तक सिमट कर रह जाती है। क्या राज्य सरकार में इतनी राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं कि वह केंद्र सरकार पर निर्णायक दबाव बना सके? या फिर छत्तीसगढ़ी भाषा सिर्फ चुनावी भावनाओं को भुनाने का साधन बनकर रह गई है?छत्तीसगढ़ की अस्मिता की बात करने वाले सत्ताधीश यह बताएं कि जब भाषा को रोजगार से नहीं जोड़ा जाएगा, तब नई पीढ़ी इसे क्यों अपनाएगी? क्या छत्तीसगढ़ी का भविष्य सिर्फ लोकगीतों, कवि सम्मेलनों और राजकीय समारोहों तक सीमित रहेगा?आज छत्तीसगढ़ी भाषा को सबसे बड़ा खतरा उपेक्षा से नहीं, बल्कि सरकार की दिखावटी नीति से है। अगर अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, आठवीं अनुसूची, शिक्षा में अनिवार्य स्थान और रोजगार सृजन तो आने वाले वर्षों में यह सवाल और तीखा होगा कि छत्तीसगढ़ी सरकार की प्राथमिकता है या सिर्फ राजनीतिक नारा?