तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
बिलासपुर संभाग अंतर्गत गौरेला–पेंड्रा–मरवाही जिले में खनिज प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए मिलने वाली डीएमएफ राशि का उपयोग एक बार फिर सवालों के घेरे में है। गुरुकुल मैदान में लगभग 50 लाख रुपये की डीएमएफ लागत से निर्मित एडवेंचर पार्क महज एक वर्ष के भीतर ही जर्जर अवस्था में पहुंच चुका है, जिससे निर्माण गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं।विभागीय सूत्रों के अनुसार, निर्माण के दौरान मानक सामग्री के स्थान पर घटिया संसाधनों का उपयोग, तकनीकी नियमों की अनदेखी और औपचारिक सुपरविजन तक सीमित निगरानी की गई। जिन एडवेंचर उपकरणों की औसत आयु 5 से 7 वर्ष होनी चाहिए थी, वे आज टूट-फूट का शिकार हैं या उपयोग के लिए असुरक्षित हो चुके हैं।सूत्रों का यह भी दावा है कि कार्य पूर्ण होने के बाद अनिवार्य गुणवत्ता परीक्षण और तकनीकी निरीक्षण केवल फाइलों तक सीमित रहे। यदि वास्तविक निरीक्षण हुआ होता तो शुरुआती महीनों में ही खामियां उजागर हो जातीं। इसके बावजूद पूर्ण भुगतान किया जाना कई स्तरों पर संदेह पैदा करता है।स्थानीय नागरिकों का कहना है कि पार्क शुरू होने के कुछ ही समय बाद उपकरणों की मजबूती पर सवाल उठने लगे थे, लेकिन शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया। वर्तमान स्थिति यह है कि बच्चों और युवाओं के मनोरंजन के लिए बनाया गया यह पार्क अब खुद दुर्घटना का कारण बन सकता है।विभागीय हलकों में भी डीएमएफ राशि के उपयोग को लेकर असंतोष बताया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि यदि मामले की निष्पक्ष और तकनीकी जांच कराई गई तो ठेकेदार से लेकर निगरानी और भुगतान से जुड़े अधिकारियों तक की भूमिका जांच के दायरे में आ सकती है।अब सवाल सिर्फ एक पार्क का नहीं है। क्या डीएमएफ जैसे संवेदनशील फंड को लापरवाही और संभावित मिलीभगत की भेंट चढ़ने दिया जाएगा, या फिर जर्जर एडवेंचर पार्क की यह फाइल किसी बड़े प्रशासनिक एक्शन की नींव बनेगी?