तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ भाजपा ओबीसी मोर्चा की प्रदेश पदाधिकारी एवं कार्यकारिणी सूची सामने आने के बाद संगठन की सामाजिक संतुलन नीति पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं। कुल 70 प्रदेश पदाधिकारी और 25 विशेष आमंत्रित सदस्यों सहित 95 सदस्यों की इस सूची में अकेले साहू समाज से अध्यक्ष सहित लगभग 40 पदाधिकारी शामिल हैं। यानी कुल संरचना का करीब आधा हिस्सा एक ही समाज के हाथों में है।इसके बाद अन्य ओबीसी जातियों की स्थिति पर नजर डालें तो तस्वीर और भी असंतुलित नजर आती है।कुरमी समाज से 12, जायसवाल समाज से 11, सोनी–सोनार समाज से 10, देवांगन और यादव समाज से 5-5, लोहार/विश्वकर्मा समाज से 3, अघरिया पटेल और मानिकपुरी समाज से 2-2 प्रतिनिधि शामिल हैं। वहीं लोधी, निर्मलकर, प्रजापति, राजवाड़े, निषाद-केवट समाज को मात्र एक-एक प्रतिनिधित्व देकर औपचारिकता पूरी कर दी गई प्रतीत होती है। श्रीवास (नाई) समाज से 2 प्रतिनिधि रखे गए हैं।सवाल यह नहीं कि साहू समाज को प्रतिनिधित्व क्यों मिला, सवाल यह है कि इतना असमान क्यों?छत्तीसगढ़ में ओबीसी वर्ग कोई एकरंगी सामाजिक संरचना नहीं है। प्रदेश में कुरमी, यादव, लोहार, निषाद, प्रजापति, लोधी, देवांगन, केवट, नाई, कुम्हार, विश्वकर्मा सहित दर्जनों प्रभावशाली ओबीसी जातियां हैं, जिनकी जनसंख्या, सामाजिक भागीदारी और राजनीतिक भूमिका किसी एक समाज से कम नहीं है।राजनीतिक विश्लेषकों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि यह सूची ओबीसी के व्यापक प्रतिनिधित्व की बजाय जातिगत गणित पर आधारित रणनीति को दर्शाती है।

सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा का ओबीसी मोर्चा वास्तव में सभी पिछड़े वर्गों की आवाज है, या फिर इसे किसी एक प्रभावशाली जाति के इर्द-गिर्द सीमित कर दिया गया है?समीक्षकों का कहना है कि यदि ओबीसी मोर्चा में संतुलित सामाजिक प्रतिनिधित्व नहीं होगा, तो जमीनी स्तर पर अन्य ओबीसी समाजों में उपेक्षा और असंतोष स्वाभाविक है। इसका असर आने वाले समय में संगठन की एकजुटता और चुनावी रणनीति दोनों पर पड़ सकता है।आज स्थिति यह बनती दिख रही है कि“ओबीसी मोर्चा” का नाम तो व्यापक है, लेकिन तस्वीर संकीर्ण प्रतिनिधित्व की है।अब यह सवाल भाजपा नेतृत्व से पूछा जा रहा है कि क्या छत्तीसगढ़ में ओबीसी वर्ग केवल एक ही समाज तक सीमित है?या फिर बाकी ओबीसी समाजों की राजनीतिक हिस्सेदारी सिर्फ कागजों तक सिमट कर रह गई है?यह विषय केवल संगठनात्मक सूची का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और राजनीतिक संतुलन का गंभीर मुद्दा बन चुका है।