तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ी भाषा के नाम पर बड़े-बड़े नारे और भावनात्मक भाषण देने वाली वर्तमान भाजपा सरकार की हकीकत अब सवालों के घेरे में है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का दावा है “हमने बनाया है, हम हीं संवारेंगे” लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग बीते सात वर्षों से अध्यक्ष और सदस्यों के बिना पड़ा है, और मौजूदा सरकार अपने दो साल के कार्यकाल में भी इस आयोग को संवारना तो दूर, कार्यशील तक नहीं बना पाई।भाजपा यह गर्व से कहती रही है कि उसके ही शासनकाल में छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा मिला और इसके विकास के लिए राजभाषा आयोग का गठन किया गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह तथा पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक के कार्यकाल को इसका उदाहरण बताया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि यदि भाजपा वास्तव में छत्तीसगढ़ी की हितैषी है, तो फिर आज आयोग नेतृत्वविहीन क्यों है?राज्य में भाजपा सरकार बनने के बाद उम्मीद जगी थी कि छत्तीसगढ़ी भाषा को लेकर ठोस फैसले होंगे। लेकिन दो साल बीत जाने के बावजूद अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति नहीं होना यह दर्शाता है कि सरकार की प्राथमिकता सूची में छत्तीसगढ़ी भाषा नीचे खिसक गई है। “संवारने” के दावे अब केवल पोस्टर और मंचों तक सीमित दिखाई दे रहे हैं।भाषाविदों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि बिना अध्यक्ष और सदस्यों के आयोग केवल कागजों में मौजूद संस्था बनकर रह गया है। छत्तीसगढ़ी भाषा के मानकीकरण, शासकीय कामकाज में उपयोग, शोध, प्रकाशन और प्रशिक्षण जैसे मुद्दों पर कोई ठोस नीति नहीं बन पा रही है। इसका सीधा नुकसान छत्तीसगढ़ी भाषा और उससे जुड़े हजारों कलाकारों, लेखकों और शिक्षाविदों को हो रहा है।अब सवाल सीधा और स्पष्ट है कि जब भाजपा कहती है “हमने बनाया है, हम हीं संवारेंगे”, तो फिर दो साल में भी राजभाषा आयोग को संवारने की शुरुआत क्यों नहीं हुई?क्या छत्तीसगढ़ी भाषा केवल चुनावी नारा बनकर रह गई है, या सरकार वास्तव में इसे उसका हक देने का साहस दिखाएगी? छत्तीसगढ़ की जनता अब सिर्फ बयान नहीं, कार्रवाई चाहती है।