अफसरशाही का घमंड! ‘हाँ या ना’ कहने की भी फुर्सत नहीं, छत्तीसगढ़ में संवादहीन होता प्रशासन।

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तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ में अफसरशाही का रवैया लगातार सवालों के घेरे में है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि अब अधिकारी न केवल आम जनता, बल्कि समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियों के संदेशों का जवाब देना भी जरूरी नहीं समझते। आश्चर्य की बात यह है कि कई मामलों में जवाब देने के लिए किसी लंबी प्रक्रिया या निर्णय की आवश्यकता भी नहीं होती, फिर भी अफसर ‘हाँ’ या ‘ना’ जैसे सामान्य उत्तर देने से भी कतराते नजर आ रहे हैं।प्रदेश में यह स्थिति अब अपवाद नहीं, बल्कि एक सामान्य प्रवृत्ति बनती जा रही है। वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि और समाज के सम्मानित नागरिक जब किसी सार्वजनिक या प्रशासनिक विषय पर संबंधित अधिकारी को संदेश भेजते हैं, तो सप्ताहों और महीनों तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती। न संदेश की प्राप्ति की पुष्टि, न समस्या पर कोई टिप्पणी। बस एक लंबी चुप्पी, जो अफसरशाही के घमंड को उजागर करती है।यह चुप्पी केवल शिष्टाचारहीनता नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ भी है। प्रशासन का काम जनता से संवाद स्थापित करना है, न कि खुद को जनता से ऊपर समझना। अफसर यह भूलते नजर आ रहे हैं कि वे जनता के टैक्स के पैसों से वेतन लेते हैं और जनता के प्रति जवाबदेह हैं। जब संवाद ही खत्म हो जाए, तो शासन और समाज के बीच भरोसा कैसे कायम रह सकता है?जानकारों का कहना है कि सत्ता का संरक्षण और जवाबदेही की कमी ने अफसरशाही में एक अलग ही मानसिकता पैदा कर दी है। कई अधिकारी यह मानने लगे हैं कि संदेशों का जवाब न देने से उन्हें कोई नुकसान नहीं होगा। यही सोच प्रशासन को संवेदनहीन बनाती जा रही है और आम लोगों के साथ-साथ प्रतिष्ठित नागरिकों को भी खुद को उपेक्षित महसूस करने पर मजबूर कर रही है।छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक संवादहीनता का यह हाल बेहद चिंताजनक है। सवाल साफ है, क्या अफसर खुद को कानून और जनता से ऊपर समझने लगे हैं? क्या जवाब देना अब उनकी जिम्मेदारी का हिस्सा नहीं रहा? और अगर यही हाल रहा, तो जनता की आवाज शासन तक कैसे पहुंचेगी?अब जरूरत है कि सरकार और मुख्य सचिव‌‌‌ विकास शील के साथ ही मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह इस बढ़ते घमंड पर सख्ती से लगाम लगाए और यह स्पष्ट करे कि संदेशों और पत्रों का जवाब देना अफसरों की जिम्मेदारी है, कोई एहसान नहीं। क्योंकि लोकतंत्र खामोशी से नहीं, संवाद और जवाबदेही से चलता है।


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