तरुण कौशिक, संपादक, सर्वव्यापी

पंचायत व्यवस्था पर उठते सवाल ग्रामीण भारत की तस्वीर अक्सर सरकारी फाइलों में चमकदार दिखाई देती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे कहीं अलग है। गाँवों की गलियों में विकास अब भी ज़्यादातर वादों और घोषणाओं तक सिमटा हुआ है। टूटी सड़कें, अधूरी नालियाँ, पीने के पानी की समस्या, सीमित स्वास्थ्य सुविधाएँ और रोजगार के अभाव से जूझते ग्रामीणों के बीच अब कर वसूली की सख़्ती ने एक नई बहस खड़ी कर दी है।पंचायतों को राजस्व बढ़ाने के निर्देश दिए जा रहे हैं और शत-प्रतिशत कर वसूली को उपलब्धि के रूप में पेश किया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या कर संग्रह ही विकास का पैमाना है? वर्षों से बुनियादी सुविधाओं से वंचित ग्रामीणों को जब कर चुकाने के लिए सख़्त आदेश मिलते हैं, तो उन्हें यह नीति असंतुलित प्राथमिकताओं का उदाहरण लगती है।ग्रामीणों का कहना है कि जब नालियाँ बहती हैं, सड़कें गड्ढों में तब्दील हैं और रोजगार के अवसर सीमित हैं, तब कर वसूली पर ज़ोर देना उनकी समस्याओं पर नमक छिड़कने जैसा है।प्रशासन का तर्क है कि कर से ही विकास संभव है, लेकिन ग्रामीणों का सवाल भी उतना ही वाजिब है—क्या पंचायतें यह भरोसा दिला सकती हैं कि वसूला गया हर रुपया गाँव की तस्वीर बदलने में ही लगेगा?या फिर यह राशि भी काग़ज़ी उपलब्धियों और रिपोर्टों की सूची में जुड़कर रह जाएगी?ग्रामीणों का मानना है कि कर देना तब सार्थक होता है, जब उसका प्रत्यक्ष लाभ दिखाई दे। बिना सुविधाओं के कर वसूली, विश्वास की नींव को कमजोर करती है।एक अहम सवाल यह भी है कि क्या कर संग्रह की सख़्ती से पहले सेवाओं की गुणवत्ता तय नहीं होनी चाहिए? सड़क, पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य और रोजगार—जब ये मूल ज़रूरतें पूरी होंगी, तब कर देना ग्रामीणों को बोझ नहीं बल्कि जिम्मेदारी लगेगा इसका जवाब प्रशासन को ही देना होगा। क्योंकि कर से ज़्यादा ज़रूरी है भरोसा, और भरोसा केवल आदेशों से नहीं, ज़मीनी काम से पैदा होता है। अगर पंचायत व्यवस्था वास्तव में गाँवों का विकास चाहती है, तो उसे पहले सुविधाओं की नींव मजबूत करनी होगी—तभी कर वसूली अपने आप आसान और स्वीकार्य बनेगी।