गौरेला -पेंड्रा-मरवाही नूर मोहम्मद, ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले का मरवाही वन मंडल इन दिनों गंभीर आरोपों और प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर सुर्खियों में है। वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के इस महत्वपूर्ण वन मंडल पर ऐसे आरोप लग रहे हैं, जो न केवल स्थानीय प्रशासन बल्कि पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली पर गहरे सवाल खड़े करते हैं। सूत्रों और स्थानीय जानकारों के अनुसार, यहां विकास कार्यों और योजनाओं के नाम पर एक समानांतर व्यवस्था संचालित हो रही है, जिसमें नियम-कायदों की बजाय प्रभाव और पहचान ज्यादा मायने रखते हैं। आरोप है कि जिन ठेकेदारों को पूर्व में ब्लैकलिस्ट किया जा चुका है या जिन पर गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगे हैं, उन्हें नए फर्म और नए नामों के माध्यम से पुनः कार्य दिए जा रहे हैं, जिससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि नियमों को दरकिनार कर मिलीभगत से काम बांटे जा रहे हैं।स्थानीय लोगों का कहना है कि कई मामलों में ठेकेदारों ने केवल फर्म का नाम बदला है, जबकि संचालन वही लोग कर रहे हैं, जो पहले से विवादों में रहे हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या विभागीय स्तर पर जांच नहीं हो रही या जानबूझकर अनदेखी की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रकार की प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगी, तो यह न केवल सरकारी योजनाओं की गुणवत्ता को प्रभावित करेगा बल्कि पारदर्शिता को भी गंभीर नुकसान पहुंचाएगा। इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक पहलू वन मंडलाधिकारी ग्रीष्मी चांद से जुड़ा एक कथित बयान बताया जा रहा है, जिसमें यह कहा गया कि “कमीशन ऊपर तक पहुंच रहा है” और शिकायत कहीं भी कर ली जाए, जांच अंततः विभागीय अधिकारियों द्वारा ही की जाएगी, जिससे नतीजा प्रभावित होना तय है।यदि इस तरह के बयान में सच्चाई है, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था और शासन की विश्वसनीयता दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। बताया जा रहा है कि इस मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर कई बार शिकायतें की जा चुकी हैं और यह शिकायतें राज्य स्तर से लेकर केंद्र स्तर तक भेजी गई हैं। यहां तक कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक भी शिकायत पहुंचने का दावा किया जा रहा है, लेकिन अब तक किसी ठोस कार्रवाई का अभाव लोगों के बीच असंतोष को बढ़ा रहा है।पूरे मामले में जांच प्रक्रिया को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि जांच की जिम्मेदारी उन्हीं अधिकारियों को दी जाती है, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उसी तंत्र का हिस्सा होते हैं, जिस पर आरोप लग रहे हैं। ऐसे में निष्पक्ष जांच की उम्मीद कमजोर पड़ जाती है और कई मामलों में जांच रिपोर्ट में अनियमितताओं को नजरअंदाज कर संबंधित लोगों को क्लीन चिट दिए जाने की बात सामने आती रही है। यह स्थिति प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है।स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों में इस पूरे मामले को लेकर आक्रोश लगातार बढ़ रहा है। लोगों का कहना है कि यदि लगातार शिकायतों के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती है, तो यह सीधे-सीधे भ्रष्टाचार को संरक्षण देने जैसा है। कई लोगों ने इस मामले में स्वतंत्र और निष्पक्ष एजेंसी से जांच कराने की मांग उठाई है, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके और दोषियों पर कार्रवाई सुनिश्चित हो।मरवाही वन मंडल का यह मामला अब केवल एक क्षेत्र विशेष का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक ढांचे की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। अब देखना यह होगा कि शासन-प्रशासन इस गंभीर मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या वास्तव में निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों पर कार्रवाई की जाती है, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह कागजों में सिमटकर रह जाएगा। यह पूरा घटनाक्रम एक ऐसे सिस्टम की तस्वीर पेश करता है, जहां शिकायतें तो ऊपर तक पहुंचती हैं, लेकिन समाधान कहीं रास्ते में ही खो जाता है। (यह समाचार प्राप्त सूचनाओं और स्थानीय स्रोतों के आधार पर तैयार किया गया है। आधिकारिक पुष्टि एवं निष्पक्ष जांच के बाद ही अंतिम निष्कर्ष सामने आएगा।)।