मरवाही वनमंडल में फिर उठे भ्रष्टाचार के सवाल: शिकायतों पर कार्रवाई नहीं, DFO की भूमिका पर गंभीर आरोप।

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गौरेला-पेंड्रा-मरवाही/नूर मोहम्मद, ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी

मरवाही वनमंडल एक बार फिर गंभीर आरोपों और प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर सुर्खियों में है। यहां पदस्थ वर्तमान डीएफओ पर शिकायतों पर कार्रवाई नहीं करने और संदिग्ध मामलों में मौन साधने के आरोप लग रहे हैं, जिससे विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं।जानकारी के अनुसार, मरवाही वनमंडल में पहले भी कई वरिष्ठ अधिकारियों पर गबन और अनियमितताओं के आरोप लग चुके हैं। पूर्व प्रभारी डीएफओ आर.के. मिश्रा, संजय त्रिपाठी, आईएफएस अधिकारी दिनेश पटेल, शशि कुमार और रौनक गोयल जैसे अधिकारियों के नाम विभिन्न शिकायतों में सामने आए थे। इन आरोपों के चलते उन्हें वनमंडल से हटना पड़ा, लेकिन जांच अब भी जारी बताई जा रही है।ऐसे हालात में शासन द्वारा नए डीएफओ के रूप में आईएफएस अधिकारी गृष्मी चाँद की पदस्थापना की गई थी। आमजन और विभागीय कर्मचारियों को उम्मीद थी कि नए नेतृत्व में वन संरक्षण, विकास कार्यों और पारदर्शिता को बढ़ावा मिलेगा तथा भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा। लेकिन वर्तमान स्थिति इन उम्मीदों के विपरीत नजर आ रही है।आरोप है कि लकड़ी तस्करी जैसे गंभीर मामलों में भी डीएफओ की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही है। शिकायतों के बावजूद विभागीय स्तर पर चुप्पी साधे रखना कई तरह के संदेह पैदा कर रहा है। आम लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि कहीं अवैध गतिविधियों को संरक्षण तो नहीं मिल रहा।विभाग के भीतर भी प्रशासनिक क्षमता पर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि कुछ चुनिंदा भ्रष्ट वनकर्मियों के प्रभाव में निर्णय लिए जा रहे हैं, जिससे पूरी व्यवस्था प्रभावित हो रही है। इसी क्रम में पूर्व सीसीएफ प्रभात मिश्रा द्वारा वरिष्ठ लिपिक आर.एस. भदौरिया को नियम विरुद्ध तरीके से कार्यमुक्त करने और सेल गुप्ता को प्रमोशन देकर हेड क्लर्क के पद पर पदस्थ करने का मामला भी चर्चा में है। बताया जा रहा है कि विभागीय नियमों के अनुसार एक ही स्थान पर पदोन्नति नहीं दी जानी चाहिए, इसके बावजूद नियमों को दरकिनार किया गया।गंभीर आरोप यह भी है कि संबंधित कर्मचारी को पिछले 10 वर्षों से व्यय शाखा-1 का प्रभार भी सौंपा गया है। यदि इस अवधि में हुए भुगतान और धनादेशों की निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो करोड़ों रुपए के गबन का खुलासा हो सकता है।वहीं, ग्रीन क्रेडिट योजना के तहत किए गए प्लांटेशन कार्यों पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि कागजों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण दिखाया गया, जबकि धरातल पर करीब 70 प्रतिशत पौधे नष्ट हो चुके हैं। न तो सिंचाई की उचित व्यवस्था है और न ही सुरक्षा के लिए बैरिकेडिंग। गुणवत्ताहीन सामग्री सप्लाई करने वाली कंपनियों को ब्लैकलिस्ट करने का आदेश भी इस गड़बड़ी की ओर इशारा करता है।सूत्रों के अनुसार, इस योजना में उच्च अधिकारियों से लेकर फील्ड स्टाफ, लिपिकीय कर्मचारी और ठेकेदारों की मिलीभगत से बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है। आरोप है कि राशि का आपस में बंदरबांट कर लिया गया।इन सभी मामलों को लेकर अब आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) से निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है। स्थानीय जनता और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो वनमंडल की स्थिति और अधिक बिगड़ सकती है।


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