गौरेला-पेंड्रा-मरवाही, नूर मोहम्मद, ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी
मरवाही वनमंडल का वन विभाग इन दिनों एक बार फिर गंभीर आरोपों और प्रशासनिक ढिलाई को लेकर चर्चा में है। आरोप है कि डीएफओ कार्यालय में लिपिक वर्गीय कर्मचारियों का ऐसा जाल बना हुआ है, जिसे पिछले एक दशक में भी कोई अधिकारी तोड़ नहीं पाया। हालात यह हैं कि करीब आधा दर्जन डीएफओ बदल चुके हैं, लेकिन कुछ “चुनिंदा बाबू” आज भी उसी कुर्सी पर जमे हुए हैं।सूत्रों के मुताबिक, सामान्य प्रशासन विभाग के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद वर्षों से एक ही शाखा में पदस्थ कर्मचारियों का स्थानांतरण नहीं किया जा रहा है। इससे न केवल नियमों की अवहेलना हो रही है, बल्कि विभागीय कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप यह भी है कि कुछ कर्मचारियों को पूर्व से लेकर वर्तमान डीएफओ तक का विशेष संरक्षण प्राप्त है, जिसके चलते उनके खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत अधिकारी नहीं जुटा पा रहे हैं।सबसे ज्यादा चर्चा भुवेंद्र साहू नामक कर्मचारी को लेकर है, जो पिछले करीब 10 वर्षों से कैम्पा शाखा में पदस्थ बताया जा रहा है। प्रमोशन के बाद भी उन्हें उसी शाखा का प्रभारी बना दिया गया और आज तक वे वहीं काबिज हैं। हैरानी की बात यह है कि उन्हें हटाने के लिए 6 से अधिक बार आदेश जारी होने की बात सामने आई है, लेकिन कोई भी आदेश धरातल पर लागू नहीं हो सका। इस पूरे मामले ने विभागीय कार्यशैली और आदेशों की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।भुवेंद्र साहू पर गोबर खरीदी से जुड़े फर्जीवाड़े और कूटरचना जैसे गंभीर आरोप भी लग चुके हैं, जिनकी गूंज विधानसभा तक पहुंचने की बात कही जा रही है। इसके बावजूद अब तक किसी ठोस कार्रवाई का अभाव, विभाग की निष्क्रियता को उजागर करता है।इसी तरह मुख्य लिपिक पद पर की गई कथित नियमविरुद्ध पोस्टिंग भी सुर्खियों में है। आरोप है कि सहायक ग्रेड-2 की कर्मचारी सेल गुप्ता पिछले 10 वर्षों से वनमंडल कार्यालय में “व्यय-1” शाखा में प्रभारी कक्ष में पदस्थ थीं। प्रमोशन के बाद भी उन्होंने इसी वनमंडल में अपनी पदस्थापना सुनिश्चित करा ली। इतना ही नहीं, वर्तमान में वे मुख्य लिपिक के साथ-साथ “व्यय-1” शाखा का अतिरिक्त प्रभार भी संभाल रही हैं।विभागीय सूत्रों का दावा है कि समिति से राशि आहरण की अनुमति में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं की गई हैं। यहां तक कि सुरक्षा निधि के नाम पर फर्जी प्रस्ताव बनाकर राशि के दुरुपयोग के आरोप भी सामने आए हैं। वर्षों तक एक ही शाखा में जमे रहना और दोहरी जिम्मेदारी निभाना, अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।इसके अलावा यह भी आरोप सामने आ रहे हैं कि कुछ बाबू अपनी कुर्सी बचाने के लिए डीएफओ के समक्ष फर्जी शिकायतें प्रस्तुत कर ईमानदार और सक्रिय कर्मचारियों को वनमंडल से बाहर करवाने का प्रयास कर रहे हैं। इससे विभाग में कार्य करने वाले कर्मियों का मनोबल भी प्रभावित हो रहा है।अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर मरवाही वनमंडल में यह “बाबू राज” कब तक चलता रहेगा? क्या डीएफओ इन गंभीर आरोपों पर संज्ञान लेकर कोई ठोस कार्रवाई करेंगे, या फिर विभाग में इसी तरह से अव्यवस्था और कथित भ्रष्टाचार का सिलसिला जारी रहेगा। फिलहाल, पूरे मामले ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।