तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

देश की सुरक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर सपूतों की शहादत को जहां पूरे देश में गर्व और सम्मान के साथ याद किया जाता है, वहीं बिलासपुर शहर के तारबाहर निवासी शहीद अश्विनी प्रधान के मामले में प्रशासनिक संवेदनहीनता एक बार फिर उजागर होती नजर आ रही है। 24 मार्च 2009 को बस्तर क्षेत्र में नक्सली हमले में शहीद हुए अश्विनी प्रधान की आज पुण्यतिथि है, लेकिन दुखद पहलू यह है कि 16 वर्षों बाद भी जिला प्रशासन, जिला पुलिस प्रशासन और जनप्रतिनिधियों द्वारा उनके परिवार को सम्मानित करने की कोई पहल नहीं की गई।शहीद अश्विनी प्रधान, वरिष्ठ नागरिक सूरत लाल प्रधान के ज्येष्ठ पुत्र थे, जिन्होंने नक्सल प्रभावित बस्तर में अपनी ड्यूटी के दौरान देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। उस समय उनकी शहादत ने पूरे क्षेत्र को गर्व से भर दिया था, लेकिन समय बीतने के साथ उनकी यादें सरकारी फाइलों में सिमट कर रह गई हैं।हर वर्ष 24 मार्च को जहां शहीदों को श्रद्धांजलि देने की परंपरा निभाई जाती है, वहीं इस वर्ष भी बिलासपुर में इस वीर सपूत की पुण्यतिथि पर प्रशासनिक स्तर पर कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया। न ही शहीद परिवार को बुलाकर सम्मानित किया गया और न ही किसी जनप्रतिनिधि ने उनके घर पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित की।सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्यों आज तक शहीद अश्विनी प्रधान के नाम पर किसी चौक-चौराहे, सड़क या शासकीय संस्था का नामकरण नहीं किया गया? जबकि अन्य स्थानों पर शहीदों की स्मृति में अनेक योजनाएं और स्मारक बनाए जाते हैं। यह स्थिति न केवल प्रशासन की उदासीनता को दर्शाती है, बल्कि समाज के लिए भी एक चिंतनीय विषय है।स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों में इस बात को लेकर गहरा आक्रोश है। उनका कहना है कि जो जवान देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर देता है, उसके परिवार को सम्मान और पहचान दिलाना प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की नैतिक जिम्मेदारी है। लेकिन यहां वर्षों से इस जिम्मेदारी को नजरअंदाज किया जा रहा है।नगर के लोगों ने मांग की है कि शहीद अश्विनी प्रधान के नाम पर जल्द से जल्द किसी प्रमुख चौक, सड़क या शासकीय संस्था का नामकरण किया जाए, साथ ही हर वर्ष उनकी पुण्यतिथि पर आधिकारिक रूप से श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित कर परिवार को सम्मानित किया जाए।अब देखना यह होगा कि इस गंभीर मुद्दे पर जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन और जनप्रतिनिधि कब जागते हैं और इस वीर शहीद को वह सम्मान दिला पाते हैं, जिसके वे वास्तविक हकदार हैं।