के. एस. ठाकुर, कार्यकारी संपादक सर्वव्यापी
कागजों में चमकता बिलासपुर, और हकीकत में सड़ता प्रशासन! एक तरफ जहां शहर को स्वच्छता के मामले में देशभर में दूसरा स्थान मिलने का तमगा मिला, वहीं दूसरी ओर उसी शहर के संभागीय मुख्यालय स्थित एसडीएम सह तहसील कार्यालय के बाहर पिछले एक हफ्ते से कचरे का अंबार प्रशासन की ‘सफाई’ की पोल खोल रहा है।स्वच्छता रैंकिंग में ऊंची उड़ान भरने वाला बिलासपुर इन दिनों अपने ही दफ्तरों में ‘कचरा प्रबंधन’ की अनोखी मिसाल पेश कर रहा है। संभागीय मुख्यालय स्थित एसडीएम सह तहसील कार्यालय के ठीक बगल में रखा डस्टबीन कब का अपनी सीमा पार कर चुका है, लेकिन जिम्मेदारों की नजर अब तक उस पर नहीं पड़ी—या यूं कहें कि देखने की फुर्सत नहीं मिली।स्थिति यह है कि डस्टबीन के आसपास कचरे का ढेर किसी स्थायी व्यवस्था की तरह जमा हो चुका है। इस गंदगी के बीच से रोजाना हजारों लोग अपने सरकारी कामकाज के लिए गुजरते हैं, लेकिन उनके स्वागत में ‘स्वच्छता का तमगा’ नहीं, बल्कि बदबू और बिखरा कचरा मुंह चिढ़ाता नजर आता है।हैरानी की बात तो यह है कि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान नायब नाजिर से लेकर एसडीएम और तहसीलदार तक किसी ने भी इस ओर ध्यान देना जरूरी नहीं समझा। मानो सफाई की जिम्मेदारी भी किसी फाइल की तरह लंबित पड़ी हो।चार दिन पहले कमिश्नर कार्यालय की ऑडिट टीम भी निरीक्षण के लिए पहुंची थी, लेकिन यह ‘विशेष आकर्षण’ उनकी नजरों से भी ओझल रहा। अब सवाल यह उठता है कि जब निरीक्षण करने वाले ही गंदगी नहीं देख पाए, तो आम जनता की शिकायत आखिर किस दरवाजे पर दस्तक दे?हालांकि जब इस मामले की जानकारी जिले के कलेक्टर संजय अग्रवाल को दी गई, तो उन्होंने तुरंत सफाई कराने का आश्वासन दिया। लेकिन सवाल वही पुराना—क्या सफाई भी अब ‘सूचना मिलने के बाद’ ही होगी?कल्लूराम न्यूज की टीम ने इस खबर के माध्यम से प्रशासन का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया है। अब देखना यह है कि ‘स्वच्छता में नंबर-2’ का तमगा बचाने के लिए प्रशासन कब तक ‘कचरे के ढेर’ को हटाने की जहमत उठाता है, या फिर यह ढेर भी किसी नई उपलब्धि का प्रतीक बन जाएगा।