गौरेला -पेंड्रा-मरवाही, नूर मोहम्मद, ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी
मरवाही वन परिक्षेत्र में कैंपा फंड के नाम पर एक बार फिर ऐसा मामला सामने आया है, जिसने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बिना वास्तविक कार्य कराए ही करीब 8 लाख रुपये के भुगतान का खुलासा हुआ है, जिसमें फर्जी हस्ताक्षरों के जरिए दस्तावेज तैयार कर राशि निकाल ली गई। हैरानी की बात यह है कि जिन कार्यों को वर्ष 2021-22 में किया गया बताया गया, उनके प्रमाणक दस्तावेज 2025 में बनाए गए, जिससे पूरे मामले में गड़बड़ी की बू और तेज हो गई है।यह कोई पहला मामला नहीं है, इससे पहले भी इसी क्षेत्र में गोबर खाद, गड्ढा खुदाई और वृक्षारोपण जैसे कार्यों में लाखों की अनियमितताओं के आरोप लग चुके हैं, लेकिन हर बार जांच के नाम पर खानापूर्ति होती रही और जिम्मेदारों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी। इस बार भी मामला सामने आने के बाद संबंधित अधिकारियों से जवाब लेने की कोशिश की गई, लेकिन विभागीय स्तर पर चुप्पी साध ली गई है, जिससे संदेह और गहरा हो गया है।पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर 36 महीने बाद कार्यों के प्रमाणक कैसे तैयार किए गए और भुगतान किस आधार पर किया गया? क्या वास्तव में जमीन पर कोई काम हुआ भी था या सिर्फ फाइलों में ही ‘कागजी जंगल’ खड़ा कर दिया गया? इस घटनाक्रम ने वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।अब निगाहें वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के मंत्री केदार कश्यप और विभाग की अपर मुख्य सचिव ऋचा शर्मा पर टिक गई हैं कि वे इस गंभीर मामले में क्या रुख अपनाते हैं। क्या दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?कैंपा फंड, जो वनों के संरक्षण और पर्यावरण संतुलन के लिए बनाया गया है, अगर उसी में इस तरह की अनियमितताएं सामने आती हैं, तो यह न केवल आर्थिक अनियमितता है बल्कि पर्यावरण के साथ भी सीधा खिलवाड़ है। अब यह देखना होगा कि शासन इस ‘कागजी हरियाली’ के पीछे छिपे सच को सामने लाता है या फिर जिम्मेदारों की चुप्पी के बीच यह मामला भी धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला जाता है।