पीसीसीएफ पद को लेकर तेज़ हलचल: नियुक्ति प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल।

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विशेष प्रतिनिधि, सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ के वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग में शीर्ष पद प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) की आगामी नियुक्ति को लेकर इन दिनों असामान्य हलचल देखी जा रही है। विभाग के वर्तमान प्रमुख व्ही श्रीनिवासन राव के मई माह में सेवानिवृत्त होने के साथ ही नए पीसीसीएफ की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज़ हो गया है।विश्वस्त सूत्रों के अनुसार, इस महत्वपूर्ण पद को लेकर विभाग के भीतर और बाहर कई स्तरों पर सक्रियता बढ़ी है। हालांकि इन चर्चाओं की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से विभिन्न दावेदारों की गतिविधियां तेज़ हुई हैं, उसने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।वरिष्ठता बनाम प्रभाव: किसे मिलेगा शीर्ष पद?वन विभाग के जानकारों का मानना है कि पीसीसीएफ जैसे संवेदनशील पद पर नियुक्ति सामान्यतः वरिष्ठता, अनुभव और सेवा रिकॉर्ड के आधार पर की जाती है। लेकिन इस बार की प्रक्रिया को लेकर अंदरखाने यह चर्चा है कि केवल पारंपरिक मानकों के बजाय अन्य कारक भी प्रभावी हो सकते हैं।सूत्रों का कहना है कि कुछ वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा अपने-अपने स्तर पर प्रभाव स्थापित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। यह भी चर्चा है कि विभागीय दायरे से बाहर जाकर भी संपर्क साधे जा रहे हैं, जिससे यह मुद्दा महज़ प्रशासनिक न रहकर संवेदनशील बन गया है।“असामान्य गतिविधियों” के साथ लेन-देन की भी चर्चाविश्वस्त सूत्रों के हवाले से अब यह चर्चा और गंभीर रूप लेती दिख रही है। बताया जा रहा है कि जिस वन अधिकारी को पीसीसीएफ बनाने को लेकर कथित तौर पर लगभग पांच करोड़ रुपये में “सौदेबाजी” की बात सामने आई थी, उसे शुरुआती तौर पर करीब एक प्रतिशत राशि दिए जाने की भी चर्चा है।हालांकि, अब जब कथित तौर पर नाम लगभग तय होने की बातें सामने आ रही हैं, तो वही अधिकारी संबंधित बिचौलियों को शेष राशि देने में आनाकानी कर रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि इस विवाद को लेकर कथित सौदे में शामिल लोगों द्वारा शिकायतें मुख्यमंत्री सचिवालय तथा केंद्र सरकार तक पहुंचाई गई हैं।यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इन सभी दावों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है, और न ही किसी जिम्मेदार पक्ष ने इस संबंध में सार्वजनिक रूप से कोई बयान दिया है।पुष्टि नहीं, लेकिन सवाल गंभीरपत्रकारिता के मानकों के अनुसार, ऐसे गंभीर आरोपों को बिना पुष्ट प्रमाण के तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। बावजूद इसके, जिस तरह से लगातार इस तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं, उससे यह संकेत जरूर मिलता है कि मामला सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया से आगे बढ़कर संवेदनशील रूप ले चुका है।शासन और विभाग की चुप्पीपूरे घटनाक्रम पर अब तक शासन या वन विभाग की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। न ही नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर कोई विस्तृत जानकारी सार्वजनिक की गई है।विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की चुप्पी कई बार संदेह को और गहरा कर देती है। यदि प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है, तो उसे सार्वजनिक करने में हिचक नहीं होनी चाहिए।पारदर्शिता की मांग तेज़वन और प्रशासनिक मामलों से जुड़े जानकारों का कहना है कि पीसीसीएफ जैसे शीर्ष पद पर नियुक्ति न केवल विभाग बल्कि पूरे राज्य की पर्यावरणीय नीतियों को प्रभावित करती है। ऐसे में यह जरूरी है कि चयन प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी हो।कुछ सामाजिक और प्रशासनिक हलकों में यह मांग भी उठ रही है कि शासन को इस नियुक्ति के लिए स्पष्ट मानक और प्रक्रिया सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि किसी भी तरह की अटकलों और चर्चाओं पर विराम लगाया जा सके।आगे क्या?फिलहाल स्थिति यह है कि मई में होने वाली सेवानिवृत्ति से पहले ही संभावित दावेदारों के बीच हलचल तेज़ है और चर्चाओं का बाजार गर्म है। आधिकारिक स्तर पर भले ही सब कुछ सामान्य बताया जा रहा हो, लेकिन अंदरखाने उठ रहे सवालों ने इस प्रक्रिया को चर्चा का केंद्र बना दिया है।“सर्वव्यापी” करेगा विस्तृत पड़तालइस पूरे मामले को लेकर जो संकेत और चर्चाएं सामने आ रही हैं, उनकी गहराई से जांच की जा रही है। “सर्वव्यापी” अपने आगामी अंकों में इस विषय पर तथ्यों, दस्तावेजों और विभिन्न पक्षों के साथ विस्तृत पड़ताल प्रस्तुत करेगा, ताकि सच्चाई सामने आ सके और जनता को सही जानकारी मिल सके।


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