तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
बिलासपुर जिले के एक राजस्व हल्के से सामने आए कथित बयान ने प्रशासनिक तंत्र की साख को कठघरे में खड़ा कर दिया है। क्षेत्र में पदस्थ एक पटवारी, जिन्हें स्थानीय लोग “पंडित जी” के नाम से जानते हैं, खुलेआम यह दावा करते बताए जा रहे हैं कि “लाखों रुपए देकर इस हल्के में आया हूं, तहसीलदार और एसडीएम सब मेरे जेब में हैं… पैसा दो और मलाई खाओ।” इस कथित बयान के सामने आने के बाद पूरे क्षेत्र में हड़कंप मच गया है और आमजन में आक्रोश बढ़ता जा रहा है।बताया जा रहा है कि संबंधित पटवारी लंबे समय से नामांतरण, सीमांकन और अन्य राजस्व कार्यों के एवज में मोटी रकम मांगने को लेकर चर्चा में रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि बिना “लेन-देन” के कोई भी काम आगे नहीं बढ़ता। फाइलें महीनों तक लंबित रखी जाती हैं और फिर अप्रत्यक्ष रूप से पैसे की मांग की जाती है। कई मामलों में यह भी सामने आया है कि संबंधित कर्मचारी ऊपरी अधिकारियों तक अपनी पहुंच का हवाला देकर लोगों पर दबाव बनाता है।ग्रामीणों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति पैसे देने से इनकार करता है, तो उसे बार-बार दफ्तर के चक्कर काटने पर मजबूर किया जाता है। एक किसान ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि “काम कराने के लिए मजबूरी में पैसे देने पड़ते हैं, वरना फाइल आगे नहीं बढ़ती। ऊपर तक सेटिंग होने की बात कहकर डराया जाता है।” इस तरह की कार्यप्रणाली से न केवल आर्थिक शोषण हो रहा है, बल्कि आम नागरिक मानसिक रूप से भी परेशान हो रहे हैं।सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक चुप्पी को लेकर खड़ा हो रहा है। इतने गंभीर आरोपों और खुलेआम किए जा रहे दावों के बावजूद अब तक न तो कोई आधिकारिक बयान सामने आया है और न ही किसी जांच की स्पष्ट जानकारी दी गई है। यदि पटवारी के कथित दावे में सच्चाई है, तो यह पूरे राजस्व तंत्र में गहरे बैठे भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। वहीं यदि यह केवल भय पैदा करने की रणनीति है, तब भी यह स्थिति उतनी ही गंभीर मानी जा रही है।राजस्व विभाग आम नागरिकों के जमीन-जायदाद से जुड़े सबसे संवेदनशील मामलों को संभालता है। ऐसे में इस प्रकार के आरोप और बयान लोगों के विश्वास को कमजोर कर रहे हैं। जानकारों का मानना है कि यदि इस तरह की प्रवृत्तियों पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो यह व्यवस्था को और अधिक खोखला कर सकती है।इधर, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज कर दी है। लोगों का कहना है कि मामले में दोषी पाए जाने वाले किसी भी अधिकारी या कर्मचारी पर सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि व्यवस्था में पारदर्शिता और भरोसा बहाल हो सके।